दर-बेदर होना एक कलंक Part-3

वास्तव में ऐसे मनुष्य के अन्त:करण से परमार्थ, रूहानियत, सूफीयत एवम्‌ सत्य को अन्तरदृष्टि से समझने अथवा अनुभव करने वाले भाव लुप्त होते जाते हैं। अन्त में ऐसा मनुष्य दैव्य गुणों अथवा अनुभूतियों से वंचित हो जाता है। भौतिक पदार्थों एवम्‌ मिथ्या सम्मान के प्रति ग्रसित हो जाता है। पदार्थवाद के अनुसार सांसारिक वाह-वाह, प्राप्त करने की प्रवृति उत्पन्न होना। उपरीक्त दोनों प्रवृतियां मनुष्य के जीवन क शी ऐसे मार्ग पर खड़ा कर देती हैं जिससे उसका जीवन नरकमय बन जाता है। मुर्शिद के दर से विमुख होकर मनुष्य को वास्तविक आन्नद की अनुभूति कदापि नहीं हो सकती। विमुखता के कारण उसकी आन्तरिक खुशी धीरे-धीरे समाप्त हो जाती है। जिस इन्सान के सिर पर सांसारिक यश तथा मायक पदार्थों का भूत सवार हो तो ऐसा मनुष्य विमुखता का परिणाम नहीं सोचता क्योंकि मन-माया उस को इस प्रकार जकड लेते हंःः कि मन ही मन वह अपने आपको सतगुरुजैसा समझने लग जाता है। जिसको अमली रूप देता हुआ एक दिन वह अपनी एक अलग हस्ती कायम कर लेता है। अपने आप पैदा की गई उस अलग हस्ती को दुनिया में मजबूत करने के लिए वह उस प्रकार की सब क्रियाएं और दिखावे करता है जो वह कभी अपने मर्शिद को वास्तविकता में करते हुए देखा करता था। सतगुरु का झूठा रूप इस प्रकार प्रस्तुत करता है कि भोले भाले लोग उसके मायावी चंगुल में सरलता से फंस जाते हैं। अर्थात नैगेटिव पावर उससे वह सब कुछ करवाती जाती है जो सच का विरोध करने के लिए आवश्यक होता है। इस संबंध में परम पूजनीय परम पिताजी के फरमाए वचन इस प्रकार हैं, “शाह मस्ताना जी कहिंदे हुन्दे सन, कि जिस वेले कबीर आया ना मातलोक ते बडी हाहाकार मची होई सी। मालिक ने कबीर जी नूं भेजिया जा रूहां नूं समझा बुझा के आ। काल ने बड़ी हाहाकर मचा रखी है। कहिन्दे जदों चलिया न कबीर नाम देण वासते, जीवां नूं समझाउण वास्ते। चाली कबीर नकली बणा के काल ने भेज दिते। अखे तुसीं कौण हो, अखे असीं वी कबीर हां। अखे कबीर तां सानूं बणा के भेजिया है, अखे असीं चाली हां, तूं तां इक है। तेरा ही नारा लावांगे, तेरी सारी कहाणी सुणांवागे, तेरे वालीआं गल्‍लां बातां करके तेरा ही सारा रंग रूप बणांवांगे गड्डीयां-वड़ीयां सारी उही नकल पूरी और आपणे मगर लगा के ……। असीं चाली ऐं भेजे हां।’ इस प्रकार सच्चे मुर्शिदे-कामिल का स्वयःां बना हुआ झूठा गुरू सच की नकल करता हुआ परमार्थ को पदार्थवाद में बदल कर रख देता है। आज के पदार्थवादी युग में मालिक से प्यार करने वाले बहुत कम और पदार्थों से प्यार करने वालों की संख्या बहुत अधिक है। अत: भौतिक पदार्थों के प्राप्त करने के लिए अधिक लोग ऐसे झूठे गुरूओं के शिष्य बन जाते हैं और उसे (गुरू को) ऐसे मार्ग पर निरन्तर नि:संकोच चलने के लिए उत्साहित करते हैं।

अब अनेकों व्यक्तियों के मन में यह विचार उत्पन्न होता होगा कि ऐसी घटनाएं भविष्य में घटित होंगी और मुर्शिद को इस विषय में ज्ञात भी होता है तो वह फिर भी इस विषय पर कुछ क्‍यों नहीं करते? यह तो वास्तविकता है कि मुर्शिद सब कुछ जानने वाला होता है कि वह अपने समीप उस सांप को बैठा कर दूध पिला रहा है जो डंक मारते समय अपने पराए को नहीं देखता। जैसे पहले भी बताया है कि सच्चा सतगुरु साधारण इन्सानी शरीर में रहता हुआ संसार में भ्रमण करता है परन्तु उनकी प्रवृति साधारण मनुष्य जैसी नहीं होती। उनकी सोच एवम्‌ हृदय इतना विशाल होता है कि ऐसी असंख्य घटनाएं हो जाने पर भी ऐसी बातों पर ध्यान नहीं देते। मुर्शिद देखने में तो साधारण व्यक्ति की तरह दिखाई देता है किन्तु वह साधारण व्यक्ति नहीं होता क्योंकि वह मनुष्य जैसा व्यवहार नहीं करता अर्थात्‌ उस व्यक्ति के साथ शब्दों द्वारा अथवा शक्ति द्वारा विरोध नहीं करता। इसमें संदेह नहीं कि देखने में सच्चा मुर्शिद संसार के लिए तो एक साधारण व्यक्ति के समान दिखाई देता है परन्तु वास्तव में उसमें अल्लाह, गॉड अथवा प्रभु विराजमान होता है जो इस संसार में विचरता है।

हम साधारण मनुष्य हैं अत: ऐसी सोच स्वभाविक हमारे अन्दर उत्पन्न होती रहती है कि कृ तघ्न अथवा अहसान फरामोश को उसके अपराध का दण्ड अवश्य या तुरन्त मिलना चाहिए। जबकि अन्तर्यामी सतगुरु अथाह रूहानी शक्ति के स्वामी होते हैं। इस विषय पर किसी द्वारा वर्णित हो जाने पर भी वह केवल मुस्करा देते हैं जैसे कुछ भी घटित न हुआ हो। मुर्शिद सर्वशक्ति मान होते हुए भी यह कह कर टाल देते हैं कि मालिक जाने उसका काम जाने। यही तो सच्चे रूहानी संत, फकीरों में और साधारण व्यक्ति में अन्तर होता है। वास्तव में परमार्थ के मार्ग पर चलने वालों में एक बड़ा भाग मौखिक आस्तिक शोें का होता है जो परमार्थ में आने वाली किसी प्रकार की देर क ः) सहन नहीं कर पाता। यदि गहराई से सोचें तो ऐसे लगता है जैसे सच्चे सतगुरु का अपने आप बना सानी मौखिक आस्तकों के एक विशेष दल का प्रधान हो। जो परमार्थ को अपने किसी विशेष कारण के लिये प्रयोग करता है। जो संसार में का हा  केवल इन्सान ही मानता है, ऐसी सोच जो किसी समय उसकी आत्मा के लिए भयंकर दुःख का कारण बनती है। ऐसी सोच उस शिष्य को जीवन के ऐसे किनारे पर लाकर खड़ा कर देती है कि उसे अपना जीवन नीरस और अर्थहीन अनुभव होने लगता है। उसक ःगे ऐसा अभास होता है कि न मैं संसार में यश प्राप्त कर सका और न ही प्रभु को प्रसन्न कर सका। जो व्यक्ति सतगुरु का झूठा आडम्बर रचता है उसके लिए क्‍या करना होगा? साधारण व्यक्ति की सोच से दूर की बात है। कठोर दण्ड उसे मिले भी क्यों ना? क्योंकि वह उसका स्वयं किया हुआ अक्षम्य अपराध होता है। क्योंकि उसने अनजान भोले-भाले लोगों को अपने पाखण्डों में फेसाकर वास्तविक जीवन के उद्देश्य से भटका दिया होता है। इसके अतिरिक्त सच्चे सतगुरु के जो शिष्य उस ढोंगी गुरू का साथ देते हैं वे भी कम दण्ड के अधिकारी नहीं होते क्योंकि आत्मा से निकले दु:ख भरे शब्द तलवार के घाव से कहीं अधिक दु:खदायी होते हैं। इस प्रकार के मनुष्य की दुःख भरी आत्मा का अभिशाप उसे डुबो देता है। उसे अधिक दण्ड भोगना पड़ता है अर्थात्‌ उसे लोक और परलोक में शान्ति नहीं मिलती। इस लिए तो कहा है:-</div>

टेक:- सतगुरु दे दर तों दूर होइया, गुर-सिक्ख वी अवारा हो जांदा।

फिर हसदा वसदा जीवन वी, दोजख दा नजारा हो जांदा।

सागर तों कतरा वख हो के अपणी औकात गंवा बहिंदा।

गंगा जल छप्पड़ां विच डिग्ग के, सड-सड के नकारा हो जांदा।

सतगुरू दे दर …….

मां पिओ दी उंगली फड़ के ही, हर बालक टुरना सिख

सकदा।

कोई अंग सबूता नहीं रहिंदा, जद आप मुहारा हो जांदा।

सतगुरु दे दर …….

इह दर ठुकराइयां सुख शांति दा, परछावां वी नहीं मिलदा।

गलीयां च भटकदे कुत्तियां तों, वी बुरा गुजारा हो जांदा।

सतगुरु दे दर …….

बेशक इह समुन्द्र चुप्प दिसदे, पर इन्हां विच वी ने कई तुफां।

चप्पूआं नाल पा के दुशमणीयां, अन्धकार किनारा हो जांदा।

सतगुरु दे दर……..

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