दर-बेदर होना एक कलंक Part-2

सजदा भी करें, शिकवा भी करें, दीवानों का ये दस्तूर नहीं।

सतगुरु तो सतगुरु है। बेअन्त रहमतों और क्षमा का भण्डार है,

जो अपने शिष्य के लिए सब कुछ करने के पश्चात उससे मिले शिकवों को भी स्वीकार कर लेता है। अंत सच्चा सतगुरु करे तो क्या करे। सतगुरु एक कोमल हृदय मालिक और कढद्रविहीन बेटे का बाप जो हुआ। शिष्य उसकी महानता से अनभिशज्ञ है परन्तु बात शिकवों पर समाप्त नहीं होती बल्कि कई बार कोई शिष्य वह सब कुछ कर देता है जो उसके लिए किसी भी दृष्टिकोण से उचित नहीं होता। अर्थात अपने सच्चे मुर्शिद का दर छोड़ कर किसी नए दर पर इस प्रकार अपने आप को समर्पित कर देता है जैसे एक भँवरा किसी फूल पर बैठने के पश्चात कोई नया फूल देखते ही बिना सोचे समझे उस पर बैठ जाता है। भँवरे और इस प्रकार के शिष्य में कोई अन्तर नहीं बल्कि भँवरा तो ऐसी प्रकार की सोच रखने वाले से कहीं अधिक अच्छा है क्योंकि एक पुष्प से रस ले लेना और दूसरे पुष्प पर जा बैठना उसका स्वभाव है। उसका कर्म है, उसका अधिकार है परन्तु एक शिष्य जो कि एक इन्सान है अत: यह सिद्धान्त उस पर लागू नहीं होता क्योंकि इसे प्रभु ने सोचने समझने और अनुभव करने की शक्ति अन्य जूनों से कहीं अधिक प्रदान की है। ऐसे शिष्य ने सब कुछ जाना, समझा तथा अनुभव किया जो एक सच्चा दीवाना अनुभव करता है। उसने भी अनुभव किया और कार किया कि मेरा मुर्शिद ही दीन ईमान दिल की धड़कन और ख्यालों का स्वामी आह मेरा सब कुछ है। जैसे कि प्रसिद्ध सूफी अली हैदर ने कहा है:-

तू ही नजर निगाह तूं सुरमा चश्म सिआह मस्तान भी तुं।

मैंडे दिलबर यार प्यारे दीन भी तूं ईमान भी तू।

हैदर साज बजावन वाला तार भी तू ते तान भी तू।

इतना कुछ मान लेने के बाद भी एक शिष्य एक भंँवरे वाली सोच पर आ जाए तो क्या इन्सानियत पर एक कलंक नही लगता? अवश्य लगता है क्योंकि सृष्टि में मनुष्य का अस्तित्व विशेष गुणों एवं अधिकारों के कारण है। यदि वह इन दैव्य गुणों एवं अधिकारों का अनुचित प्रयोग करने लग जाए तो इन्सानियत पर लगा एक कुरूप धब्बा ही तो है। धब्बों के साथ-साथ एक ऐसी दुर्घटना जिसमें घायल हुआ मनुष्य इस अवस्था में पहुंच गया जिसे मैडिकल भाषा में कोमा (पूर्णत: बेहोशी) में चले जाना कहा जाता है। पूर्ण बेहोशी में एक ऐसी स्थिति जिसमें इन्सान चारपाई पर लेटा हुआ है केवल श्वास क्रिया हो रही है जिसमें उसे जीवित रहने की संज्ञा दी जाती है वह अन्य कोई ऐसी क्रिया नहीं कर सकता जो अन्य प्राणी कर सकते हैं। ऐसी स्थिति इन्सान की न जीवित रहने में न मरने की होती है। कई लोगों का विचार होता है कि ऐसी स्थिति में तो प्रभु उसे अपने पास बुला ले तो अच्छा है क्योंकि पूर्ण बेहोशी में चले जाने के बाद होश में आने का समय निश्चित नहीं होता। कई बार तो इन्सान वर्षों इसी अवस्था में बेसुध हुआ चारपाई पर पड़ा रहता है। मुर्शिद के दर से विमुख होकर एक ऐसे झूठे व्यक्ति की शरण में चले जाना जो आत्मा को गुमराह करता है, एक दुर्घटना से कम नहीं है। कई व्यक्ति सोचते हैं कि दुर्घटनाएं तो सड़कों पर होती हैं अर्थात उनके अनुसार किसी वाहन का दूसरे वाहन से टकरा जाना ही दुर्घटना होती है। जबकि दुर्घटना का अर्थ है एक वस्तु का दूसरी वस्तु से टकराकर टूट जाना अर्थात बिखर जाना। इस प्रकार मुर्शिद के प्रेम में रंगी ठीक पथ पर चलती आ रही आत्मा का इन्सानी मन द्वारा ऐसी वस्तु से टकरा जाना जिसकी उत्पति धोखा-धड़ी, अकृतघ्न, अहसान फरामोश और विमुखता के भण्डार से हुई हो। आत्मा की इस दुर्घटना के कारण शोचनीय अवस्था में चले जाना, जहां पर उसकी कोई पुकार नहीं सुनी जाती अपितु सदा के लिए रोना तथा पश्चाताप करना ही रह जाता है। आत्मा की इस दयनीय अवस्था का अनुमान नही लगाया जा सकता। जैसे प्रत्येक जीवित प्राणी को जीवित रहने के लिए भोजन की आवश्यकता है उसी प्रकार आत्मा की खुराक सच्चे मुर्शिद के दीदार होते हैं। यदि दीदार के न होने वाली सजा उसको मिल जाए तो उसकी भूख कैसे शांत होगी और कितनी देर आत्मा अपने आपक शो असहनीय पीड़ा में रख सकेगी? अधिक सोचने की आवश्यकता नहीं क्योंकि सच्चे मुर्शिद से विमुख हो चुके शिष्य की आत्मा उपरोक्त अवस्थाओं में रहती हुई सृष्टि में अपना समय पूरा करती है। ऐसी बात नहीं है कि ऐसे विमुख हुए व्यक्ति की आत्मा उसको रोकती नही, अवश्य रोकती है परन्तु इन्सान को मिले खुद मुख्तयारी वाले अधिकारों का प्रयोग वह इतनी तीव्रता से करता है कि आत्मा की आवाज दब कर रह जाती है।

सच्चे सतगुरु के आदेशानुसार उनके साथ रहने वाले कुछ इन्सान जो मुर्शिद के दर्शन दीदार एवम्‌ रूहानी वचनों द्वारा अलौकिक आनन्द को प्राप्त करते हैं, पर जैसे कहते हैं कि कहर सहन किया जा सकता हैं लेकिन सतगुरु की अपार रहमत और प्रसन्नता को सहन करना कठिन होता है। इस तथ्य के आधार पर कई बार सच्चे सतगुरु के निकट होते किसी व्यक्ति के मन में यह विचार उत्पन्न हो जाता है कि सतगुरु तो हमारे जैसा लगता है। इनमें (सतगुरु) और हमारे में कोई अधिक अन्तर नहीं लगता। वास्तव में इत्र को निरन्तर सूंघने से उसकी सुगन्धि को अनुभव करने की शक्ति प्राय: कम हो जाती है। उसको इन में से कोई विशेष सुगन्धि अनुभव नहीं होती। अर्थात ऐसी सोच वाले इन्सान के मन में एक ऐसा जनून सा भर जाता है कि वह अपने मुर्शिद को अपना मुर्शिद न समझ कर एक साधारण इन्सान समझने लग जाता है। मौला आदमी बन आया वाला विचार उसके मन से लुप्त हो जाता है। यह विचार उसके मन में घर कर जाता है कि मुरशिद द्वारा प्राप्त हुई रहमतें तथा खुशियों को अनुभव करने वाली शक्ति उस शिष्य में से अदृश्य हो जाती है। अब सतगुरु के पवित्र मुखारबिन्द से निकले सच्चे और मीठे वचन उसको इस प्रकार लगते हैं जैसे एक साधारण इन्सान दूसरे इन्सान से बातें कर रहा हो। मुर्शिद द्वारा आशीर्वाद के लिए उठा हाथ उसको कोई विशेष क्रिया करता अनुभव नहीं होता। ऐसी विशेष क्रिया जिसके अनुसार सतगुरु के कर कमलों दारा निकली इलाही तरंगें आत्मा की थकावटोें दुःख  रेशानियां आंख की एक पलक झपकने के समय में समाप्त कर देती हैं। इस प्रकार की रूहानी वेव-लैंथ जिनके विषय में लिखकर बता देना एक अत्यन्त कठिन कार्य है। जो केवल अनुभव करने पर कंपकंपी अथवा करंट के हल्के मीठे एवम्‌ आनन्दमयी झटके के समान अनुभव होती है। इसके अतिरिक्त मालूम नहीं कितनी ही बेअन्त खुशियों के दरवाजे इन्सान के लिए खुल जाते हैं। जिस पर सच्चा सतगुरु अपनी नजर मेहर करता हुआ आशीर्वाद प्रदान करता है। परन्तु ऐसे व्यक्ति के लिए यह बात कोई विशेष अर्थ नहीं रखती जो सतगुरु को केवल मनुष्य समझने की भूल कर रहा होता है।

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