सच को दबाने की हर युग मे नाकाम कोशिश

सत्य का सूर्य न कभी छिपा है न छिपेगा |
झूठे ,झूठ दे पिंजरे दे विच, सच पंछी नू ताड नही सकदे….।

प्रेमी, शिष्य, भक्त अथवा मुरीद कहें एक ही बात है किंतु इनको अलग अलग नामों से पुकारा जाता है। ‘मुरीद’ शब्द का यदि गहराई में जाकर अर्थ निकालें तो उसका अर्थ है ‘मुर्दा’ । मुर्दे से भाव उसमें स्वयं हरकत करने की शक्ति न हो । क्योकिं रूहानयित मेँ एक सच्चा  शिष्य अपने मुर्शिद कामिल के आगे अपनेआप को  एक मुर्दे के समान प्रस्तुत करे । अर्थात् जैसे मुर्शिद चलाए वैसे चले, वैसे ही आचरण करे । जब किसी शिष्य ने अपने  आपको मुर्शिद के समक्ष उपरोक्त भाव से समर्पित कर दिया तो समझ लो कि वह मुर्शिद का अपना ही हो गया।

फिर दयालु सतगुरु हर क्षण उसके साथ रहता है । किसी की कोई शक्ति नहीं कि कोई उसकी ओर अंगुली उठा सके ।

यह सब कुछ दृढ विश्वास पर निर्भर है । इसमें कोई संशय नहीं है कि शिष्य को सत्य मार्ग पर चलते हुए अनेक  कठिनाइयों का समाना करना पड़ता है । इस भयानक युग में बुराई सच्चाई से चिढ़ती हैं । वह नहीं चाहती कि कोई मालिक का पवित्र नाम  जप सके । अत: वह बुराई शिष्य के समक्ष अनेक विघ्न उत्पन्न कर देती है । उसने (शिष्य ने ) ऐसी बातों के विषय में कभी सोचा तक नहीं होता जो उसके सामने खडी हो जाती हैँ । क्योंकि मन तो छलिया है और हमेशा जीव को  धोखा देता रहता है । अर्थात् सच्चा मुरीद इसका विश्वास न करे और अपने रहबर सच्चे मुर्शिद के संकेत पर आचरण करता रहे । श्रद्धा की सीमाओँ में पूर्ण रूप से बंधा हो अर्थात् दृढ विश्वासी हो तो फिर कच्चा धागा भी उसके लिए लोहे की कठोर बेडी का कार्यं करता है अर्थात् उसे कोई  तोड नहीं सकता। चाहे महाकाल क्यों न आ जाए ।

प्राचीन काल से मालिक स्वरूप संतों, फकीरों तथा प्रभु के सच्चे आशिकों पर झूठे दोषारोपण लगते रहे हैँ । इस समय में भी संसार ने मालिक के प्यारों कौ आंखों पर नहीँ बिठाया । जब वह प्रभु का सच्चा आशिक़ इस  दुनिया से चला जाता है तब यही संसार उसके नाम पर पवित्र स्थान बनाकर उसको याद करता है । शायद दुनिआँ को ऐसी ही प्रथा होगी ।

फकीरो  और भक्तों पर इस संसार ने अपने स्वार्थ की पूर्ति न होते देख कर निकृष्ट दोषारोपण लगाकर अपना  स्वार्थ सिद्ध करने का प्रयास किया है । चाहे इन सब झूठे आरोपों का उन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा परंतु यह वास्तविकता है कि असत्य दोष लगाने चालों की पीढियां आज तक भी संसार मेँ घृणा की दृष्टि से देखी जाती हैं “कुछ लोग ऐसे भी थे कि उस समय की वास्तविकता से भलिभांति परिचित थे । पर समय की हकूमत और ताकत  के डर से उन्होंने कुछ न बोलने में ही अपनी भलाई समझी । उस समय दुनिया ने उन सच्चे भक्तों का साथ नही दिया था । पर जिसको सच्चे मुर्शिद -कामिल का सहारा उसकी दुनिया की कोई भी परवाह नहीं होती।

आओ ! इस सम्बंध मैं इतिहास पर दृष्टि डालें । प्राचीन समय मैं पूरन नाम का भक्त ( पूरनभक्त ) हुआ है। वह वास्तव में सच्चा भक्त था । उस पर भी निष्कृष्ट दोषारोपण लगा ।

एक शक्तिशाली राजा सलबान था किंतु नि:संतान था । उसकी रानी का नाम इच्छरां था । वह बहुत मधुर भाषी,विन्रम एवं शांत स्वभाव की अबला थी । बहुत समय के पशचात भी जब राजा के घर संतान न हुई तो उसने  दूसरा विवाह कर लिया । उसको दूसरी पत्नी का नाम लूणा था । वह अत्यंत ईष्यालु व कठोर स्वभाव की स्वामिनी थी । उसने आते ही रानी इच्छरां को महल से निकलवाने के लिए हठ किया और राजा को कहने लगी या  तो मै रहूंगी या वह । राजा को अब चिंता सताने लगी । उसे एक उपाय सूझा । उसने अपने महल से कुछ दूर दूसरा महल बनवा दिया । उसमें रानी इच्छरां रहने लगी ।कई  वर्ष बीत गए छोटी रानी के भी संतान न हुई पर प्रभु की अनुकम्पा से पहली रानी इच्छरां के घर पुत्र-रत्न की प्राप्ति हुईं । उस सुंदर बालक का नाम पूरन रखा गया। बालक अति सुंदर सबको अपनी ओर आकर्षित करने वाला था । ऐसा प्रतीत होता था कि मानो कोई असाधारण तेजस्वी बालक हो । जिसने पूर्व जन्म में अत्यंत भक्ति क्री हो । उसके मुख पर एक प्रकार का बिशेष आकर्षण था । मानों वह कोई ओजस्वी हो । जैसे कहा भी है:

‘हौनहार बिरवान के होत चिकने पात ‘

वह जब अपनी माता को मालिक का नाम जपते देखता तो बहुत प्रसन्न होता और उसे देखकर आनंद आता । अत: वह भी उसी मार्ग पर चल पडा । उसे भी आंतरिक आनंद की अनुभूति होने लगी । ऐसा होना स्वाभाविक भी है । पूरन ने जब किशोरावस्था मेँ प्रवेश किया तो अपने मित्रों के साथ खेलने लगा और मधुर बाते अपनी जननी को सुना कर मुग्ध करने लगा । लूणा को जब इस बिषय में मालूम हुआ तो वह ईंष्यों रूपी अग्नि मैं जल उठी ।

एक दिन अपने अतरंग मित्रों के साथ पूरन खेल रहा था कि उसकी गेंद अकस्मात लूणां के महल में जा गिरी । वह गेंद लेने के लिए महल के अंदर चला गया । जब लूणा ने पूरन को  देखा तो वह सभी रिश्ते-नाते भूलकर उस पर मोहित हो गईं । कहते है पूरन की सुंदरता को देख कर चांद भी शरमा जाता था । उसने पूरन को बुलाकर अपने बुरे विचारों से अवगत करा दिया । किंतु पूरन में मालिक का सच्चा प्रेम था । वह सदा उसके विचित्र नशे में मग्न रहता था । उसने कहा, नहीं, यह महापाप है । तुम तो मेरी माता हो । क्या हुआ जो मैने तुम्हारी कोख से जन्म नहीं लिया ? मैने तो आपको माता का दर्जा दिया हुआ है और मैं आपका अपनी माता के समान सम्मान करता हूं । यह कहकर पूरन वहां से चला गया ।

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