नन्हा कंधा;अंधाधुंध बोझ

धुंधला है भविष्य फिर भी घिसे जा रहे हैं,

ये नन्हे मुन्ने बच्चे कलम किताबे चाहते हैं,

पर पत्थर घिसे जा रहे हैं।

बिट्टू आज फिर फैक्ट्री जाते हुए रस्ते में स्कूल बस का इंतज़ार करते बच्चो को देख फिर उन्ही में खो गया। मन ही मन स्कूल जाने की चाहत बड़ रही थी, वह भी औरो की तरह स्कूल मो वर्दी पहन सुबह फैक्ट्री की बजाए स्कूल पड़ने जाना चाहता था।

कुदरत का बंटवारा भी अलग अलग है किसी को इतना ऐश,और कोई नन्ही उम्र में मजदूरी के बोझ तले मरता है। बाल श्रम छोटे बच्चों को उनके मासूम, यादगार व बचपन के पलों से महरुम कर देता है। यह उनकी स्कूली शिक्षा को जारी रखने में बाधा उत्पन्न करता है क्योंकि यह उन्हें मानसिक, शारीरिक, सामाजिक और नैतिक रुप से परेशान करता है। यह बच्चों के साथ-साथ देश के लिए भी बहुत ही खतरनाक और हानिकारक बीमारी है।

आज दुनिया भर में 215 मिलियन ऐसे बच्चे हैं जिनकी उम्र 14 वर्ष से कम है। और इन बच्चों का समय स्कूल में कॉपी-किताबों और दोस्तों के बीच नहीं बल्कि होटलों, घरों, उद्योगों में बर्तनों, झाड़ू-पोंछे और औजारों के बीच बीतता है।

लोग इन मासूमो को छोटू,मुन्ना पता नही क्या क्या कहकर बुलाते हैं, जरा सोचकर देखो इनकी जगह आप हो तो आपके मन मे भी इतना तो होगा ही कि सामने वाला कम से कम इज्जत से पेश आए।

कुछ मुख्य कारण बाल श्रम के:-

  • गरीबी के कारण गरीब माता-पिता अपने बच्चों को घर-घर और दुकानों में काम करने के लिए भेजते हैं।
  • दूकान और छोटे व्यापारी भी बच्चों से काम तो बड़े लोगों के जितना करवाते हैं परन्तु दाम उनसे आधा देते हैं क्योंकि वो बच्चे हैं।
  • बच्चे ज्यादा चालाक नहीं होते हैं इसलिए ज्यादा चोरी और ठग का अवसर नहीं मिलता है।
  • व्यापार में उत्पादन लागत कम लगने के लोभ में भी कुछ व्यापारी बच्चों का जीवन बर्बाद कर देते हैं।
  • बच्चे बिना किसी लोभ के मन लगा कर काम करते हैं।

यही कारण है जो इन नन्हे मज़दूरों के हाथों से झूठे बर्तन और औज़ार के बजाए किताब नही आ पाती। और यह बदलाव किसी एक या सिर्फ सरकार से नही बल्कि सबकी भागीदारी से होगा तभी इन बच्चों का भविष्य मज़दूर की बजाए अफसर में बदलेगा।

एक दिन ऐसे ही दोस्तों के साथ बाहर घूमने निकल दिए रस्ते में एक होटल पर रुके जहां एक नन्हा मासूम उस समय झूठे बर्तनों के ढेर में फंसा हुआ था,उस मौसम में जिसमे चाय भी चूल्हे से उतरते ही ठंडी हो जाये। ऐसी कड़कती ठंड में वो मासूम ठंडे पानी मे बर्तन धो रहा था। वाकई मेरे रोंगटे खड़े हो गए थे ऐसी मजबूरी देखके और तो और बर्तन धुले तक नही थे,इतने में तो होटल का मालिक 20 आवाजे लगा चुका था जल्दी टेबल साफ कर दे। वो बेचारा एक बार उठके टेबल साफ करने जाए एक बार बर्तन, आखिर में वही जाके पूछ लिया उससे “नाम क्या है तुम्हारा”

“केसर बच्चे ने जवाब दिया”

“यहाँ सिर्फ काम करने आते हो? मैने पूछा”

“हां, मै अपनी दादी के साथ रहता हूँ, और यही से 2000 मासिक कमाके गुज़ारा और होटल का बचा हुआ खाना खाके पेट भरता हु।”

“मैने परेशानी भरी निगाह से फिर पूछा यहाँ काम करके जो पैसे मिलते हैं उनसे तस्सली हो जाती है? स्कूल जाने का मन करता है।”

“तस्सली कर लेता हूँ दादी को खाना खिला पाता हूं यही बहुत है, स्कूल गया तो दादी की दवाई और खाना नही आएगा।”

इससे ज्यादा मुझसे उसकी हालत सुनी नही गई औऱ हम वहाँ से चल दिये । न जाने कितने औऱ मासूम केसर ऐसे ही पेट गुज़ारा करने के लिए यूँ कोमल हाथों को झूठे बर्तनों और औज़ारों में गुलाम बनाये रखते हैं।

सरकार द्वारा इतने कानून बनाने के बावजूद बाल मजदूरी आज भी सबसे ऊपर है गम्भीर समस्याओं में। किसी के माँ बाप लालच में आके बच्चो से मजदूरी कराते हैं, तो किसी के मजबूरी में। पर वजह चाहे कोई भी हो पिस तो ये मासूम ही रहे हैं। अतः मेरा तो यही मानना है अगर कोशिश दोनों तरफ से हो तो सब सम्भव है,जरूरी है कदम कौन उठाता है।

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