दर-बेदर को मजबूरी कहना कायरता Part 3

‘खुदा की खुदाई में हर शू अमल है

जरूरी न होता तो हरगिज न होता।’ ‘

जब जागे तभी सवेरा’ क ‘ी कहावत को ध्यान में रखते हुए यदि कोई इन्सान (शिष्य) फिर भी आत्मा के दिये हुए ख्याल को वास्तविक रूप दे तो विश्व में कोई ऐसी शक्ति नहीं जो उसको अद्भुत रूहानी आनन्द से वंचित कर सके। चाहे उसने कितने भी अपराध क्‍यों न कि ये हों। उपरोक्त अपराध शब्द का भावार्थ प्ृतगूरु के दर से विमख होने से लिया गया है। अथवा ऐसे शिष्यों से जो दो ही नहीं अनेकों किश्तियों पर सवार हैं अर्थात्‌ सतगुरु के अतिरिक्त अन्य स्थानों पर अपनी श्रद्धा व्यक्त करने को साधारण सी बात समझते हैं। याद रखो सच्चे सतगुरु के शिष्य को जो खुशी एवम्‌ फटकार सतगुरु द्वारा प्राप्त होती है उसमें रहस्य छिपा होता है जिसका समय आने पर पता चल जाता है। यह विचार इसलिए व्यक्त किये जा रहे हंःः क्योंकि एक शिष्य जो अपने भविष्य से अपरिचित है अर्थात आने वाले अपने भले-बुरे समय से अनजान है। कई बार वह यह सोच लेता है कि मैं उचित मार्ग पर चल रहा हूँ फिर भी मुझे मुर्शिद की फटकार तथा नाराजगी का सामना क्यों करना पड़ता है? इस सम्बध में एक बार मौलवी रूम साहिब ने अपने मुर्शिद से पूछ ही लिया था कि हे मुर्शिद जी! मुझे और कितना समय इस दुनिया में दुःखमयी जीवन व्यतीत करना होगा। मेरे प्रति आप का क्या निश्चय है? इस पर उसके मुर्शिद ने जोश में आकर उत्तर दिया :-

‘जहाँ चाहूँ तुझे ले जाऊँ

जहाँ चाहूँ तुझे रखूँ

तूँ चुप रह कर हुक्म को मान।।’

सतगुरु के दर से विमुख हुआ शिष्य कई बार अपनी गलती पर पश्चाताप कर रहा होता है। परन्तु सामाजिक अथवा मानसिक बन्धनों के कारण सतगुरु के समक्ष आने से कतराता है और आन्तरिक रूप में आत्म-ग्लानि तथा  श्चाताप की आग में जल रहा होता है। यहाँ पर भी वह एक बड़ी भूल और अपराध कर रहा होता है और स्वयं को ऐसा दण्ड दे रहा होता है, जिसका अन्त सतगुरु के समक्ष पश्चाताप करने से ही होता है। इसके सम्बन्ध में परम पूजनीय हजूर महाराज संत डॉ. गुरमीत राम रहिम सिंह जी इन्सां फरमाते हैं

शाह मस्ताना जी बचन लिखाया जी

पल्‍ला मौज दा थोन्‌ फड़ाया जी।

पखण्डी गुरूआं दे हथ जो चढ़ेआ,

जाऊ नरकां दे विच पाइया जी।।’

“यह वचन आज के नहीं, बेपरवाह शाह मस्ताना जी महाराज ने फरमाए और लिखवाए थे। अब भी लिखे हुए हंःः कि भाई! आपको उस मालिक का दामन पकड़वा रहे हैं, उस मालिक से आपका मिलाप करवा रहे हैं, पर इसके साथ-साथ अनेकों पाखण्डी गुरू बन कर बैठ जाएंगे, दुकाने खोल लेंगे, तुम्हें फंसाने के लिए, तुम्हें अपनी ओर ले जाने के लिए और जिसने मौज का दामन छोड दिया उसको बख्शा नहीं जाएगा। नर्कों में डाला जाएगा। इन वचनों ने इतिहास का वह शब्द बदल दिया कि गुरू का शिष्य कैसा भी हो उसे नर्कों में नहीं डाला जाता। पर बेपरवाह मस्ताना जी ने वह बदल कर कह दिया कि जो शिष्य गुरू से विमुख हो गया उसको नर्कों में डाला जाएगा। उसके पश्चात परम पिताजी ने फरमाया, अगर कोई भूल से किसी समय बिछ॒ड़ भी गया, उस पर दया मेहर करके उसे बख्श भी दिया। पूर्ण फकीर का फरमाया हुआ वचन, उस पर दया करके कुल मालिक ही रहमत कर सकता है। अत: पहले भी रहमत की अब भी रहमत कर रहे हैं कि तू भटक गया था और आया नहीं। जब जी चाहे कोई भी जो ऐसा ख्याल करता है कि बेपरवाह मस्ताना जी के वचनों से वह फिर गया था। शर्म से नहीं आता अथवा किसी कारण से। उसे कभी भी परम पिता जी ने नहीं रोका और न ही रोका जाएगा।”

हजूर महाराज जी आगे फिर फरमाते हैं :- “यह स्पष्ट ही कर दिया बेपरवाह जी ने कि भाई! अगर कोई विश्वास करता है तब भी और विश्वास नहीं करता तब भी अगर उसने अपने मालिक का दर छोड़ दिया तो उसे बख्शा नहीं जाएगा। पर वही रहमत करके उसी ज्योति ने, मालिक ने उसको बदल कर यहां सजा देकर अपने में मिलाया।”अत: दयनीय अवस्था के पात्र हे शिष्य ! अब कुछ नहीं बिगड़ा अभी भी तेरे पास समय है यदि तू अपना समय पूरा होने से पहले-पहले अपने ऊपर लगे विमुखता के ऐसे रोग को समाप्त करना चाहता है, जिसका समाधान सच्चे सतगुरु की रुणामई एक मुस्कराहट है। तब मुर्शिद के दर की ओर ख्याल लेकर अपना कदम उठाकर आगे उस मंजिल की तरफ बढ़ जहां सतगुरु प्रकट रूप में बैठा है। वह बख्श देगा क्योंकि वह महान है। वह ऐसी उच्च हस्ती एवम्‌ असीम शक्ति है जिसमें तेरे जैसे असंख्य गुनाहगारों को बख्श देने की पूर्ण समर्था है। बख्श देने का अर्थ केवल माफ कर दिया कह देना नहीं होता बल्कि जब सतगुरु शिष्य क श) उसके गुनाहों की माफी देता है तो शिष्य के उन गुनाहों का भार वह स्वयं उठाता है। ऐ भूले भटके इन्सान तूने सतगुरु के कामों से क्या लेना है वह कुछ भी करे, तू अपनी निपटा। तू सच्चे हृदय से पश्चाताप कर और सतगुरु की हस्ती के बराबर किसी अन्य को अपनाने का साहस न कर और निम्नांकित पंक्तियों को सदा ध्यान में रख।

‘रख वरज जरा इन्हां अखियां नूं

बिना गुरू तो दूजा तकना ना।

लवीं समझ नजारा सतगुरु दा,

विच गैर दा ओहला रखना ना।’

सच्चा सतगुरु शिष्य को बख्शते समय उसके लिए एक ऐसी शक्ति भी बख्शता है जिसके द्वारा शिष्य को एक ऐसे उत्साह तथा आत्म-शक्ति की प्राप्ति होती है, जो उसे उसके मुर्शिद से कभी भी अलग नहीं कर सकती। पर यदि शिष्य उस ताकत का मशल्य जान ले तो। फिर शिष्य ऐसे आनन्दमयी,वैराग्यमयी तथा सच्चे नजारों से भरपूर हो जाता है। जिसके विषय में किसी शायर ने लिखा है :-</div>

‘हम वहां हैं, जहां से हम को भी, कुछ हमारी खबर नहीं आती’

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