गरीबी:- बिखरती लाचारी

“आज फिर निकले थे दौरा करने, पर सड़क पर नज़ारो से ज्यादा लोंगो के बिखरे हाथ,मेरी खुशी को गरीब बना गए….

भारत, गरीबी और भिखारी; लगता है जैसे की मैंने तीन पर्यायवाची शब्दों के नाम लिए हों। सुन ने में अच्छा तो नहीं लगता, मगर सच्चाई तो यही है की हमारा देश गरीब देशों की श्रेणी में काफी ऊपर है (आंकड़ों के आधार पर)।

ग़रीबी एक ऐसा धब्बा है जो या तो मेहनत न करे तब,या कोई सारे हक़ मार ले। अक्सर देखा है फुटपाथ पर झुर्रियां पड़े चहेरे एक एक निवाले के लिए भीख मांगते हैं। इन्हें तो किसी ने बेघर कर दिया अपना स्वार्थ पूरा होने पर,किन्तु उनका क्या जो अधेड़ उम्र में भीख मांगते हैं जिस उम्र में वह कमाकर खा सकते हैं। कमाल है लाचारी को भी कुछ लोग शौक बना लेते हैं।

कहाँ से सिमटेगी ये गरीबी जब एक लाचार को देख दूसरा उसी को पैसे कमाने का रास्ता बनाले। कितने भी फुटपाथ,मेट्रो स्टेशन,रेलवे स्टेशन और मन्दिर देख ले हर जगह इन्ही की भीड़ लगी मिलती है, कोई लाचारी में हाथ पसारता है,कोई मेहनत से बचने के लिए भीख मांगता है।

अक्सर वही एक जैसे चेहरे बैठे मिलते हैं साथ मे 2–4 मासूम बच्चो को गोद मे लिए जिनकी बचपन से किशोरावस्था वही पड़े पड़े निकल जाती है। किसी ने तो फिर भी किसी के कहने पर कुछ सामान खरीद वही बैठ बेचना शुरू कर दिया ताकि गुज़ारा कर सके। पर उनका क्या जिन्हें आदत ही भीख मांग खाने की हो गई हो।

बेचारे बुज़ुर्ग जिस उम्र में बिस्तर पर आराम करते हुए अपने पोते पोती को खिलाते हुए होने चाहिए, उस उम्र में वो दर दर के धक्के खाते हैं पेट का गुज़ारा करने के लिये जिसका कोई भरोसा नही कितने दिन भूख से मरना पड़े। इस गरीबी के चलते देश का हर चौथा इंसान हर रात भूखे पेट सोता है। जिसमे आंकड़ो के मुताबिक 78 लाख लोग बेघर है । जो कि फुटपाथ या आश्रमों में सिकुड़े पड़े रहते हैं।

दिल्ली में 71% भिखारी सिर्फ गरीबी की वजह से है जिनमें से 66% से ज़्यादा लोग सक्षम शरीर वाले हैं जो कमाके खा सकते हैं, पर कुछ लोगो की लत ही मांगके खाने की लगी है जिसे वो खुद ही बदल सकते हैं वरना ये गरीबी के आंकड़े यूँही बढ़ते रहेंगे।

तो बात ऐसी है कि कौन जिम्मेवार है इसका? कुछ लोगों का मानना है कि सरकार और सरकारी कानून (देश कि अर्थव्यवस्था), तो कुछ लोग मानते हैं कि सबकी अपनी अपनी किस्मत है और पूर्व जन्म कि कमाई; जितने लोग उतने ही सोच।

खैर!!! तो बात ऐसी है कि जैसा मेरा मानना है कि 90% भिखारी जो खुद पर दया या प्रेम भाव कि उम्मीद आपसे रखते हैं ये उनकी खुद कि मेहनत का नतीजा होता है। क्यूंकि, भिखारियों ने इसे अपना धंधा बना लिया है। ऐसी बहुत सी जगह आपको भारत में देखने को मिल जाएगी जहाँ सप्ताह के अलग अलग दिनों में इनका जमावड़ा होता है। कारण, ये है कि उस दिन लोग काफी मात्रा में उस जगह पे होते हैं; और इनकी (भिखारियों) कि वेश भूषा पे तरस खाकर लोग इन्हें कुछ न कुछ तो दे ही देंगे कुछ लोग, मदद समझ कर इन्हें पैसे देते हैं, तो कुछ लोग पुण्य का काम समझ कर, और मेरे जान ने वाले एक बंधू का तो ये मानना है कि “मेरे पास है तो मैं दे सकता हूँ, उनके पास नहीं है तो वो भीख मांग रहा है”।

क 6 या 7 साल का मासूम सा बच्चा अपनी छोटी बहन को लेकर मंदिर के एक तरफ कोने में बैठा हाथ जोडकर भगवान से न जाने क्या मांग रहा था।
कपड़े में मैल लगा हुआ था मगर निहायत साफ, उसके नन्हे नन्हे से गाल आँसूओं से भीग चुके थे।
बहुत लोग उसकी तरफ आकर्षित थे और वह बिल्कुल अनजान अपने भगवान से बातों में लगा हुआ था।
जैसे ही वह उठा मैने बड़ी हिम्मत कर बढ़ के उसका नन्हा सा हाथ पकड़ा और पूछा-
“क्या मांगा भगवान से”
उसने कहा-
“मेरे पापा मर गए हैं उनके लिए स्वर्ग,
मेरी माँ रोती रहती है उनके लिए सब्र,
मेरी बहन माँ से कपडे सामान मांगती है उसके लिए पैसे”।
“तुम स्कूल जाते हो”
मैने पूछा..
“हां जाता हूं” उसने कहा।
“किस क्लास में पढ़ते हो ?” मैने पूछा
“नहीं पढ़ने नहीं जाता, मां चने बना देती है वह स्कूल के बच्चों को बेचता हूँ, बहुत सारे बच्चे मुझसे चने खरीदते हैं, हमारा यही काम धंधा है” बच्चे का एक एक शब्द मेरी रूह में उतर रहा था ।

“ तुम्हारा कोई रिश्तेदार”
न चाहते हुए भी बच्चे से पूछ लिया।
“पता नहीं, माँ कहती है गरीब का कोई रिश्तेदार नहीं होता,
माँ झूठ नहीं बोलती,
पर,
मुझे लगता है मेरी माँ कभी कभी झूठ बोलती है,
जब हम खाना खाते हैं हमें देखती रहती है,
जब कहता हूँ 
माँ तुम भी खाओ, तो कहती है मैने खा लिया था, उस समय लगता है झूठ बोलती है “
“बेटा अगर तुम्हारे घर का खर्च मिल जाए तो पढाई करोगे ?”
“बिल्कुलु नहीं”
“क्यों”
“पढ़ाई करने वाले गरीबों से नफरत करते हैं,
हमें किसी पढ़े हुए ने कभी नहीं पूछा – पास से गुजर जाते हैं”
मैं हैरान भी और शर्मिंदा भी।
फिर उसने कहा
” हर दिन इसी मंदिर में आता हूँ, कभी किसी ने नहीं पूछा – यहा सब आने वाले मेरे पिताजी को जानते थे – मगर हमें कोई नहीं जानता। 
“बच्चा जोर-जोर से रोने लगा” और बोला जब बाप मर जाता है तो सब अजनबी क्यों हो जाते हैं ?”
मेरे पास इसका कोई जवाब नही था और ना ही मेरे पास बच्चे के सवाल का जवाब है।
ऐसे कितने मासूम होंगे जो हसरतों से घायल हैं।

इसे देख तो सच मे इस गरीबी के धब्बे को एक मिनट में साफ कर देने का मन करता है, गरीबी और लाचारी तो इसे कहते हैं।और इसी को कुछ लोगो ने पेशा बना लिया जिस वजह से उन्हें मदद नही मिल पाती जिन्हें असल मे इसकी जरूरत है।

ये 21वीं शताब्दी है, और गरीबी आज भी लगातार बढ़ रहा गंभीर खतरा है। 1.35 बिलियन जनसंख्या में से 29.8% से भी अधिक जनसंख्या आज भी गरीबी रेखा 

गरीबी से अनेक तरह के प्रभाव भी पड़ते हैं जिन्हें रोकने की बेहद जरूरत है जैसे:-

  • निरक्षरता: पैसों की कमी के चलते उचित शिक्षा प्राप्त करने के लिये गरीबी लोगों को अक्षम बना देती है।
  • पोषण और संतुलित आहार: गरीबी के कारण संतुलित आहार और पर्याप्त पोषण की अपर्याप्त उपलब्धता जो ढ़ेर सारी खततरनाक और संक्रामक बीमारियाँ लेकर आती है।
  • बाल श्रम: ये बड़े स्तर पर अशिक्षा को जन्म देता है क्योंकि देश का भविष्य बहुत कम उम्र में ही बहुत ही कम कीमत पर बाल श्रम में शामिल हो जाता है।
  • बेरोज़गारी: बेरोज़गारी की वजह से गरीबी होती है क्योंकि ये पैसों की कमी उत्पन्न करता है जो लोगों के आम जीवन को प्रभावित करता है। ये लोगों को अपनी इच्छा के विपरीत जीवन जीने को मजबूर करता है।
  • सामाजिक चिंता: अमीर और गरीब के बीच आय के भयंकर अंतर के कारण ये सामाजिक चिंता उत्पन्न करता है।
  • घर की समस्या: फुटपाथ, सड़क के किनारे, दूसरी खुली जगहें, एक कमरे में एक-साथ कई लोगों का रहना आदि जीने के लिये ये बुरी परिस्थिति उत्पन्न करता है।
  • बीमारियां: विभिन्न संक्रामक बीमारियों को ये बढ़ाता है क्योंकि बिना पैसे के लोग उचित स्वच्छता और सफाई को बनाए नहीं रख सकते हैं। किसी भी बीमारी के उचित इलाज के लिये डॉक्टर के खर्च को भी वहन नहीं कर सकते हैं।
  • स्त्री संपन्नता में निर्धनता: लौंगिक असमानता के कारण महिलाओं के जीवन को बड़े स्तर पर प्रभावित करती है और वो उचित आहार, पोषण और दवा तथा उपचार सुविधा से वंचित रहती है।

हर काम सरकार नही कर सकती कुछ मेहनत खुद से भी करनी पड़ेगी कोशिश दोनों तरफ से होगी तभी बदलाव लाया जा सकता है। जरूरत है सोच बदलने की मेह्नत करने की और उनके लिये प्रयास करने की जो वाकई गरीबी से ग्रसित है। जरूरत है उन लाचार बुज़ुर्गो को सम्मान देने की उन्हें घर मे इज्जत से रखने की ताकि उन्हें दर दर भटकना ही न पड़े।

शराब और अन्य तरह के नशे करने के बजाय मेहनत कर अपने बच्चों के उज्ज्वल भविष्य बनाने की सोचे तो हमें ये मासूम चाय के स्टॉल ओर फुटपाथ की बजाए स्कूल में पढ़ते दिखेंगे। कोशिश करेंगे तो बदलाव भी होगा, समय लगेगा पर सब सम्भव होगा । सवाल है कोशिश किसकी तरफ से होती है। अन्यथा ये गरीबी का भूत ऐसे ही निगलता रहेगा।

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