रूहानियत

रूहानियत में बाहरी दिखावे का कोई काम नहीं

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सवांग रच के ना कभी खुदा को पकड़ पाओ,

ये अन्दर की बात है अन्दर के द्वार खटकाओ।

सच्चे सतगुरु का प्रेम एक ऐसा गीत है जिसकी रचना बिना किसी सुर-ताल के हुई होती है। ऐसे गीत का विकास शिष्य के लिए मुर्शिद एवं शिष्य के मध्य में इलाही जज़बों के अनुभवों का आनन्द लेना होता है। ऐसे सच्चे तथा पवित्र सूफीआना अनुभव में अक्ल-इल्म की दखल अन्दाजी निरन्तर स्थिरता के मार्ग में एक मुख्य अड़चन है। इलाही इश्क में पूर्ण रूप से मग्न हुए एक शिष्य के अन्दर मुर्शिद के प्रेम एवं सत्कार की भावना को लेकर विचार करना ही हमारा ध्येय नहीं है। हमारा उपरोक्त भावों का वर्णित करने का भाव एक शिष्य के लिए स्वयं अनुभव करके ‘मुर्शिद’ प्रति आन्तरिक बनी भावना और एक ऐसा शिष्य जिसने स्वयं वर छ अनुभव नहीं किया बल्कि वह पहले शिष्य की देखा देखी करके स्वयं पर तथा दूसरों पर प्रभाव डालने का प्रयास करता है, इस भाव से है।

प्रत्येक शिष्य का यह महत्वपूर्ण कर्तव्य है कि वह अपने सच्चे ‘मुर्शिद’ की प्रशंसा के लिए अत्यन्त सम्मान युक्त शब्दों का प्रयोग करे। चाहे यह बात लिखना अनिवार्य नहीं है क्योंकि सब अपने ‘मुर्शिद’ की उपमा के लिए ऐसे शब्दों का प्रयोग करते हैं जो सतगुरु की हस्ती के लिए आवश्यक होते हैं। जैसे सतगुरु को आप, पिताजी, महाराज जी, खुदा, कुल मालिक आदि कहते हैं। यदि कोई साधारण बात सुनाते समय हमारे सतगुरु के लिए साधारण शब्दों का जैसे तू.वह आदि का प्रयोग करता है तो हमें ऐसा सुनना मुश्किल हो जाता है। चाहे वह इन्सान सतगुरु की शान के खिलाफ नहीं बोल रहा होता, वैसे ही साधारण बात करता हुआ इस तरह से बात सना रहा होता है जैसे वह साधारण व्यक्ति की बात कर रहा हो। फिर भी हमें बेचैनी अनुभव होती है। इसके अतिरिक्त कई बार कोई सच्चा शिष्य बात करते समय ‘मुर्शिद’ के प्रति ऐसे शब्दों का प्रयोग करता है जो कोई साधारण व्यक्ति भी उनकी बात को सुनाते समय ऐसे शब्दों का प्रयोग करने से संकोच करता है। पर उस शिष्य की बात को सुन कर अत्यन्त आनन्द की अनुभूति होती है। हृदय चाहता है कि उसकी बात को निरन्तर सुनते ही जाएं। बात सुनाने वाला अति प्रिय लगता है। ऐसा क्यों होता है? इस ‘क्यों’ क उत्तर हमारे आज के उपरोक्त विचार हैं। वास्तव में स्वयं अनुभव करो कि उस भावना को बयान करना एक ऐसा सिद्धांन्त है जो उपरोक्त प्रश्न का उचित उत्तर है। दूसरे शब्दों में यह कह लो कि जो मनुष्य किसी अन्य को बात सुनाते समय जिस गहराई से आवाज निकालता है, वह बात उस सुनने वाले पर भी वहीं पर ही प्रभाव डालती है। हमारा कहने का तात्पर्य यह नहीं कि आवाज गले के अतिरिक्त शरीर के किसी अन्य अंग से निकाली जाए, आवाज तो गले में से ही निकलती है। कहने का अभिप्राय: है उस आवाज में उत्पन्न हो रही बात को मानवीय भावनाओं के किस प्रकार के प्रवाह में से निकाला जा रहा है। यह एक सच्चा अनुभव है कि कोई किसी को बात सुनाते अथवा समझाते समय यदि अन्त:करण से बात करता है तो वह सुनने वाले के हृदय को अन्त तक प्रभावित करती है। यदि अन्त:करण से अर्थात सच्चे एवं वैराग्यमयी हृदय से बात सुनाने वाला न हो तो उसका पुभाव दूसरों | पर कदापि नहीं पड़ता। अर्थात  उस बात का हृदय में का प्रश्न ही पैदा नहीं होता। हम प्रत्येक वार्तालाप अथवा घटना पर यह सिद्धांन्त राय नहीं करते। किन्तु अधिकतर देखने में आया है कि इस प्रकार ही सच्चे सतगुरु के आदर एवं वैराग्यमयी भावना को जब कोई अन्त:करण से सुनाता है तो वह बात आनन्दमयी होनें के साथ-साथ वैसा प्रभाव भी डालती है जैसी वर्णित करने वाले की भावना होती है।

उदाहरणार्थ एक सच्ची घटना इस प्रकार वर्णित है। एक बार हजूर महाराज जी शाम की मजलिस के पश्चात्‌ या फा में चले गए। पिताजी को मिलने वाली साध-संगत गुफा के सामने एकत्रित हो गई। उस सारी संगत को पिताजी से सम्पर्क करवा दिया था। इसके पश्चात्‌ और भी मिलने वाले थे। सारी संगत को तथा प्रबन्धकों को दर्शन देकर सन्तुष्ट करके पिताजी गुफा में चले गए। दरबार के साधु भाई मोहन लाल जी गुफा के बाहर आकर खड़े हो गए थे। वे अभी अन्य सत्‌ ब्रह्मचारी सेवादारों से किसी विषय पर बातचीत कर रहे थे कि इतने में एक प्रेमी ने आकर भाई मोहन लाल जी से विनय की कि मुझे पिताजी से मिलवा दो। भाई जी ने कहा अब तो पिताजी गुफा के अन्दर चले गये हैं अथवा आप पहले आते, अब तो मुश्किल है। इतना सुनकर उस प्रेमी ने पुनः कहा, नहीं जी! मुझे तो उनसे अवश्य मिलवाओ, मैंने तो मिल कर ही जाना है। भाई मोहन लाल जी ने पुन: बडे? प्रेम से समझाते हुए कहा हम तुम्हें समझते हं?, प्रात: आपको अवश्य मिलवा देंगे, अब तो हमारे वश की बात नहीं रही, अब तुम आराम करो।’ किन्तु इन बातों का प्रेमी पर कोई प्रभाव नहीं हुआ। वह कहने लगा, नहीं मुझे नहीं मालूम मुझे तो तुरन्त पिताजी से मिलवाओ’। अन्य सेवादारों के समझाने पर भी उसने आग्रह न छोड़ा तो भाई मोहन लाल जी ने जोश में आकर क हा, “उहनूं आपदे भणोईए नूं किसे वेले आराम वी कर लैण दिया करो, सारा दिन तुहाड़ा (साध-संगत) ही गोहा-कू ड़ा करदा रहन्दा है।” इतना सुनकर उस प्रेमी भाई को खूब समझ आ गई और वह आराम करने के लिए सचखण्ड हाल में चला गया। मैं भी उस समय वहीं खड़ा था।

मैंने देखा कि भाई जी की कही इन दो पंक्तियों ने मेरे अतिरिक्त अन्य सत्‌ ब्रह्मचारी सेवादारें के हृदयों को भी हिला कर रख दिया। अर्थात द्रवित कर दिया था। मेरी आंखें गफा की ओर निहारती हुई एक टक देखती रहीं। ऐसा वातावरण अनुभव करते हुए मेरी आंखों में अश्रुधारा बह उठी। प्रसिद्ध शायर

“जफर’ ने क्या सुन्दर लिखा है :-

“जब कोई बात दर्द मुहब्बत की चल पड़ी,

आँसू की बुँद आँख से निकल पड़ी। ”

साथ खड़े सत्‌ ब्रह्मचारी सेवादार भाइयों के चेहरे भी उतर गए थे। मेरा दिल चाहता था कि उन भाइयों से गले मिल कर ऊंची आवाज में रो पड़ूं। उस पहले आए प्रेमी को तथा अन्य को रो-रो कर सुनाऊं, ‘चाहे पिताजी खुद डर खुदा कुल मालिक हैं आए तो इन्सानी चोले में हैं, भी भूख-प्यास गई उन्हें भी आराम की आवश्यकता है।’ मेरे इन विचारों की श्रृंखला तब टूटी जब मेरा एक साथी मुझे कहीं जाने के लिए बुलाने आ गया। सत्‌ ब्रह्मचारी सेवादार भाई जा चुके थे। उस घटना के अगले दिन मुझे ज्ञात हुआ कि मिलने आई साध-संगत को पिताजी देर रात तक गुफा में मिलते रहते हैं। तत्पश्चात अपने कमरे में बैठकर साध-संगत द्वारा भेजे गए पत्रों को पिताजी स्वयं पढ़ते-पढ़ते प्रात: के दो-तीन बज जाते हैं। प्रात: जल्दी उठकर फावड़ा चलाना, परिश्रम करना नित्य का कार्यक्रम है। फिर पिताजी कितना समय आराम करते होंगे? यह सब कुछ भाई मोहन लाल जी स्वयं देखते हैं। अत: उसने स्वयं वेदना को अनुभव किया और आवाज के द्वारा व्यक्त कर दिया। बात करते समय किन शब्दों का प्रयोग करना है, याद नहीं रहा। किन्तु यह वास्तविकता है कि अन्त:करण से निकली सच्ची आवाज दूसरों पर अवश्य प्रभाव डालती है। उस वार्तालाप में प्रयोग किए हुए शब्दों की ओर कोई ध्यान नहीं देता, केवल उसके गहन अर्थ सब प्रकार के भावों को स्पष्ट कर देते हैं। लेकिन कई बार देखा गया है कि कुछ लोग स्वयं को दूसरों के समक्ष कुछ विशेष सिद्ध करने के लिए ऐसे शब्दों का प्राय: सहारा लेते हैं जिनको न कहने वालों को और न ही सुनने वालों को आनन्द आता है।

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