रूहानीयत में वफादारी ही पहली सीढ़ी Part-3

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इसमें कोई सन्देह नही कि सच्चा सतगुरु मालिक, प्रभु, परमात्मा से किसी प्रकार से कम नहीं होता। सच्चे सतगुरु की एक विशेषता यह है कि शिष्य को किसी अवस्था में अकेला नहीं छोड़ता। प्रत्येक क्षण शब्द रूप में उसके अंग-संग रहता है। परन्तु जैसे कहते हैं कि “आप मरे जग प्रलय।” यदि एक शिष्य का सीमित बुद्धि अथवा अक्ल द्वारा किसी गैर से नाता जोड़ने का विचार वास्तविक हो गया तो उसकी आत्मा तो दुविधा में फंस गई। आत्मा जो सच्चे सतगुरु के जिगर का एक टुकड़ा होती है। सतगुरु के दर्शन ही आत्मा की खुराक होती है। आत्मा को दुविधा में इसलिए कहा गया है कि रूह ही आत्मा है,परन्तु है बेमुख शिष्य के शरीर में। अब चाहे भी तो अकेली स्वयं शरीरमें से निकल कर सतगुरु के पास कैसे चली जाए। पहुंच सकती ही नहीं क्योकि यह तो विधि का विधान है जो ऐसा करने में रुकावट डालता है। नहीं तो रूह तो चेतन का पुन्ज है। उसके समक्ष एक हड्डियों और मांस से निर्मित शरीर का क्या अस्तित्व है जो आत्मा को ऐसा करने से रोक सके। रूह शरीर में कैद होने के कारण विवश होती है। आत्मा के लिए उस समय तक जल के बिना मछली के तड़फने का समय आरम्भ हो जाता है जब तक शिष्य मन के प्रति विरोधता करके सच्चे मुर्शिद के इलाही स्वरूप का ख्याल करते हुए कदम नहीं बढ़ाता।

पूर्ण सच्चा सतगुरू शिष्य के प्राणों का आधार होता है। वह शिष्य को प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से समझाता रहता है। उसे विशेष प्रकार के अनुभव करवाता रहता है। जिसके विषय में उसने (शिष्य) स्वप्न में भी कभी सोचा नहीं होता। इतना ही नहीं भूतकाल में हुए अनुभवों का वर्तमान में अहसास करवाता है कि अमूक समय में मेरे सतगुरु ने मेरी रक्षा की थी। अमुक विपति से मेरा इस प्रकार छुटकारा करवाया था। यहां एक बात लिखनी आवश्यक है, वह यह है कि मालिक ने मनुष्य को खुद मुख्यतारी का जो अधिकार दिया है और साथ में मन रूपी अदृश्य दुश्मन स्थापित किया है जो शिष्य के समक्ष ऐसा चक्रव्यूह रचाता है कि सब तरह के अनुभवों को एक तरफ रख देता है। वह शिष्य को सतगुरु से बेमुख होने के लिए अधिक से अधिक प्रयास करता है। मन अत्याधिक शिष्यों के समक्ष ऐसे चक्रव्यूह की रचना करता है परन्तु खुद मुख्तयारी वाले अधिकार का प्रयोग करते समय कुछ अविश्वासी शिष्य थर्मामीटर के पारे के समान डावांडौल होते रहते हैं। मन के समक्ष नत-मस्तक हो जाते हैं। एक ऐसा नया खसम बना लेते है जो स्वयं पहले से मन का हर पक्ष से गुलाम बना होता है। चाहे ऐसा गुरू बडे! धर्म-कर्म तथा ज्ञान की बातें सुनाता है। लेकिन साधारण लोग स्वयं बने गुरू से प्रभावित हो जाते हैं जैसे पहले ही बताया गया है कि कमजोर वृति के इन्सान किसी के बाह्मपन क गे देखकर जल्दी ही प्रभावित हो जाता है, परन्तु अमलों से विहीन होने के कारण ऐसा स्वयं बना हुआ गुरू उस शिष्य की आत्मा के लिए अत्यन्त द:खदायी सिद्ध होता है। जैसे कहते

“आप तो बाबा बैंगण खाए,

औरों को उपदेश बताए। ”

“अमलां दे बाझों जी,

आलमां इल्म निकम्मे सारे। ”

जैसे मछली खाने के पश्चात्‌ः वह इन्सान क शी पानी के बिना रहने नहीं देती। चाहे वह इन्सान पानी के बिना किसी अन्य तरल जैसे दूध,लस्सी, शहद आदि का सेवन करता रहे पर जितनी देर वह पानी नहीं पीता उसके अन्दर जलन और बेचैनी समाप्त नहीं होती। पानी ही अन्दर की उस अग्नि को शांत करने की क्षमता रखता है। इसी प्रकार अपने ऐसे सच्चे सतगुरु जिसने शिष्य के सभी बुरे कर्मों का भार अपने ऊपर ले लिया होता है उसे छोडकर शिष्य चाहे कहीं भी भागा फिरे अर्थात किसी के आगे मस्तक क्‍यों न झुकाता फिरे और श्रद्धा को व्यक्त करे। आत्मा की बैचैनी और विरह रूपी अग्नि तब तक शांत नही होती जब तक शिष्य के सच्चे पश्चाताप के आँसू सतगुरु के चरणें में गिरते नहीं। जब तक ऐसा शिष्य सच्चे मन से पश्चाताप नहीं करता। सतगुरु शक्तिशाली है अर्थात सर्वशक्तिमान है। दयालु है,बखशणहार है, क्षमा कर देगा। वह किसी के अधीन नहीं है। वह बडे।-बडे। अपराधियों को क्षमा दान दे देता है। यदि आपके प्रति उसके हृदय में दया आ गई तो समझ लेना कि आपके अपराध समाप्त हो गए क्योंकि उसके नजरे-करम में से निकली एक अदृश्य किरन असंख्य पापों का नाश कर देती है। यह तभी होगा यदि शिष्य के सच्चे अन्त:करण से पश्चाताप का निकला हुआ लावा फू ट पडें/। विश्वास करें सच्चे पश्चाताप से निकले हुए दो आँसू ‘मुर्शिद’ को ऐसे शिष्य को क्षमा करने के लिए विवश कर देते हैं। शिष्य जो अपने मन के पीछे लगकर भयानक अपराध कर बैठता है उसका समाधान केवल सतगुरु ही कर सकता है। डीगें मारने को वह कै सी डीगें मारे पर वास्तविकता को रती भर झुठलाया नहीं जा सकता।

 इस सम्बन्ध में परम पूजनीय हजूर महाराज सन्त गुरमीत राम रहिम सिंह जी इन्सां फरमाते हैं:- (अहंकार और मन ऐसी भयानक शक्ति है काल की पता नहीं कब यह गुरू से बेमुख कर दे। पर गुरू पूरा हो, कभी भी वह अपने उस बच्चे को छोड़ता नही।’बच्चा चाहे कहीं भागता फिरे परन्तु मालिक की दृष्टि में वह उसका बच्चा ही है। कोई ज्यादती करता है, गलत काम करता है, उसका दण्ड अवश्य मिलता है और उसकी खुशी अवश्य अदृश्य हो जाती है अर्थात वह खुशी मिलनी बंद हो जाती है। डीगें मार कर वह दुनिया को चाहे कितना ही कुछ बताता रहे हम बडे! प्रसन्न हैं, बहुत कुछ हमें मिलता है। हम सच्चे सौदे के पूरे जानकार हैं पर रूहानियत के विषय में यदि कोई कहे कि हम जानते है,उसकी मूर्खता है। रूहानियत में यदि सारी जिन्दगी भी लगा दी जाए तो उसे क ःई पढ़ नहीं सकता। जितना हम इसकी गहराई में जाएंगे उतना ही ज्ञान प्राप्त करते जाएंगे। अत: हमें अधिक ज्ञान प्राप्त करने के लिए समय चाहिए। उसको मिलने के लिए श्रद्धा और निष्ठा की आवशकता है|

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