पूर्ण मुर्शिद

पूर्ण मुर्शिद ही शिष्य के लिए रब्ब है :गुरु पूर्णिमा पर विशेष

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पूर्ण मुर्शिद
Dera Sacha Sauda

जिनको शक हो वो करें और खुदाओं की तलाश,
हम तो बस इनको ही दुनिया का खुदा कहते हैं।

एक सच्चे शिष्य के लिए उसका सतगुरु-मुर्शिद ही वास्तव में उसका माता-पिता, बहन-भाई, सम्बधी एवम् मित्र अर्थात सब कुछ होता है। ऐसे सच्चे सतगुरु के प्रेम को समस्त जीवन,अन्तिम सांस तक निरन्तर प्राप्त करते रहना बहुत बड़ी और विशेष बात है। यहां पर इस बात को बहुत बड़ी इसलिए लिखा गया है क्योंकि यह शत-प्रतिशत सत्य है कि कलियुग के इस समय में अपने सतगुरु का ही केवल आश्रय लेने वाले बहुत कम शिष्य होते हैं। जो किसी प्रकार की दुःख-चिन्ताओं और संसार की शर्म का फिक्र किए बिना अपने सतगुरु के सिवाय, किसी को कुछ भी नहीं समझते।

किन्तु अधिक गिनती में वे मुनष्य (शिष्य) आते हं? जो वास्तव में शिष्य जैसे पवित्र शब्द को अपमानित करते हैं। क्योंकि शिष्य का अर्थ ही मुर्शिद के प्रति तन-मन न्योछावर कर देना होता है। अर्थात उसका मुरीद हो जाना अथवा सेवक हो जाना होता है। तन-मन से सतगुरु का हूं कह देना, सरल होता है किन्तु हो जाना बहुत बड़ी तथा विचित्र बात है। क्योंकि स्वयं को पूर्ण रूप से अर्पित करने के पश्चात शिष्य की अपनी कोई इच्छा शेष नहीं रहती। जब शरीर के साथ मन को भी उसके आगे अर्पित कर दिया तो उसकी रजा को मानना ही जीवन का वास्तविक आनन्द लेना होता है।

सूफी साहित्य में इस तथ्य को समझाने के लिए एक मालिक और उसके बनने जा रहे सेवक के मध्य हुए वार्तालाप का उल्लेख इस प्रकार मिलता है।

मालिक– तुम्हारा नाम क्या है?
सेवक– जिस नाम से मुझे पुकारोगे वही मेरा नाम हो जाएगा।
मालिक– आपका भोजन क्या है?
सेवक– जो भी आप मुझे प्रसन्नता से खाने के लिए दोगे, वही मेरा भोजन है।
मालिक– तुम वस्त्र किस प्रकार के धारण करोगे?
सेवक– जैसे आप पहनने के लिए दोगे, वैसे पहन लूंगा।
मालिक– तुम कौन सा कार्य कर सकते हो?
सेवक– जिस कार्य को करने के लिए आप मुझे आज्ञा देंगे मैं उसे करने के लिए तत्पर रहूंगा। अपनी इच्छा से नहीं।
मालिक– तुम्हारी क्या इच्छा है?
सेवक– हे स्वामी! सेवक की कोई इच्छा अथवा मर्जी नहीं होती। जो आपकी इच्छा अथवा रजा है, वही मेरी इच्छा है।

यह वार्तालाप हमारे उपरोक्त विषय को पूर्णतय: स्पष्ट कर देता है। शिष्य के लिए सच्ची प्रसन्नता मुर्शिद के हा; व उनके वचन मानने में ही होती है। सतगुरु के आदेश को बिना किन्तु-परन्तु के मानते रहना ही वास्तव में बहुत बड़ी बात है। वास्तव में आज्ञा को न मानने वाले व्यक्ति को ‘मुर्शिद’ का रूप मालिक का रूप नहीं लगता बल्कि उसे साधारण व्यक्ति मानने लग जाता है।
यही सोच उसे मालिक से दूर करती है और वह बे-दर हो जाता है। बे-दर एक ऐसा मार्ग है जहां पर टिकाया एक पग नरक की ओर अग्रसर करता है। दु:खों और कष्टों के दलदल में फंस कर ही इस प्रकार के व्यक्ति को ‘मुर्शिद” की कदरो-कीमत का पता चलता है। कई बार गलती का आभास तभी होता है जब वह वृद्ध हो जाता है। इस अवस्था के विषय में कहा जाता है :-

“पिछले पहर की बात है, शायद कबूल हो न हो”।

किंतु पूर्ण सतगुरु महान होता है, करूणा का सागर होता है। अपराधी को क्षमा कर देना उसकी फितरत में शामिल होता है। जिस के अनुसार इस अवस्था में आए शिष्य को भी अपने हृदय से लगा लेता है। इस प्रकार के दृश्य को देखकर सतगुरु को ‘बख्शणहार’ कहना बहुत बढ़िया लगता है। ऐसा बख्शणहार जिसका आदि काल से यही कर्म है। वह इस कर्म को भली-भांति बड़ी प्रसन्नता से निभाता है। किन्तु उपरोक्त विषय में बात सतगुरु की नहीं अपितु सतगुरु के शिष्य के अपने अन्तःकरण में मुर्शिद के प्रति बनी भावना की है। क्या शिष्य का यही कर्तव्य है कि वह साधारण व्यक्तियों की भांति मुर्शिद को महत्व दे?
अथवा फिर अन्तःकरण में कुछ विशेष अनुभव करके अपने को विशेष महत्व देता है। ऐसी महता देकर सतगुरु को सम्मानित किया जाए जो कहने सुनने से परे की बात हो।

नि:सन्देह सभी धर्मो तथा सभी रूहानी संतों सूफी फकीरों ने अपने ‘सतगुरु’ को रब्ब, अल्लाह, गॉड, भगवान माना है। पूर्ण सतगुरु के प्रेमी का यह भाव स्थाई होना अनिवार्य है। वह अपने सतगुरु के बिना और किसी को कुछ न समझे। यहां तक कि सृष्टि की रचना करने वाले प्रभु को भी सतगुरु की तुलना में कुछ न समझे । पर यहां एक विशेष बात लिखनी अनिवार्य है सुनी-सुनाई बात को दृढ़ता से कह देना परिपक्व न होने के कारण उतनी आनन्ददायक नहीं होती जितनी कि उस तथ्य को अनुभव करके कहना।

क्योंकि सुनी-सुनाई बात को डंके की चोट पर विश्व में कहते समय कई बार इन्सान का मन साथ नहीं देता और इसी कारण से ही उसे सच्ची प्रसन्नता प्राप्त नहीं होती। सत्य होने पर भी वह बात इतनी दृढ़ नही होती। परिणाम स्वरूप कई बार कोई साधारण किन्तु चालाक व्यक्ति ऊंची आवाज का सहारा लेकर ऐसे शिष्य को चुप करा देता है। जिसका कारण यह है कि अन्तःकरण में परिपक्व॒ता न होने के कारण अटल सच्चाई होने पर भी देखने में प्रतिकूल दिखाई देता है। किन्तु स्वयं अनुभव करके दृढ़ दृष्टिकोण वाला व्यक्ति जब ‘मुर्शिद’ की वास्तविकता एवं महता को विश्व के सामने रखता है तो बडे/-बड़े विद्वानों की जुबान ही नहीं बल्कि ‘विवेक’ भी साथ छोड़ देता है।

उदाहरणार्थ– एक व्यक्ति ने दिल्ली नगर स्वयं घूम कर देखा नहीं पर उसकी शान-शौकत को लोगों से सुना है। पर जब वह किसी को दिल्ली के विषय में डंके की चोट पर सुनाएगा तो श्रोताओं को उतना आनन्द नहीं आएगा। श्रोताओं में से कोई व्यक्ति उससे दिल्ली के विषय में प्रश्न करेगा तो वह उसकी सन्तुष्टि नहीं करवा सकेगा। क्योंकि उसने स्वयं कुछ देखा नहीं केवल सुना है। सुनी सुनाई बातें चाहे शत-प्रतिशत सत्य हो पर उसमें उतना वजन नहीं होता जितना आंखों देखी बात में होता है।

अब एक ऐसा व्यक्ति जिसने ‘दिल्ली’ को स्वयं देखा है जब वह किसी को इसके विषय में बताएगा तो किसी का साहस नहीं कि उसकी बात को असत्य प्रमाणित कर दे क्योंकि उसके पास प्रत्येक प्रश्न का पूर्ण उत्तर होता है। इसी प्रकार ही सच्चा पूर्ण सतगुरु स्वयं मालिक होता है। कण-कण में विराजमान अथाह शक्ति ने ‘बन्दे’ का रूप धारण किया होता है। चाहे किसी से सुन कर ‘सतगुरु’ को खुदा कहना शिष्य के लिए बहुत अच्छी, लाभदायक तथा अनिवार्य बात है। पर उस शिष्य के स्वयं के अनुभव से वंचित होने पर शिष्य का मन विचलित हो जाता है, क्योंकि वह सतगुरु को मात्र एक साधारण व्यक्ति मानने लगता है। इससे दृढ़ विश्वास में शिथिलता आना स्वाभाविक है और उसे कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।

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हमारा यहां उपरोक्त विषय में भावार्थ यह है कि अपने सच्चे सतगुरु को केवल जुबान द्वारा कह कर मालिक खुदा न मानो अपने अन्त:करण ख्यालों द्वारा ‘मुर्शिद’ को खुदा के स्वरूप मे देखो। वह खुदा-पाक जिसके ऊपर और कुछ नहीं है। इस सम्बन्ध में शहनशाह मस्ताना जी महाराज के जीवन की एक कथा प्रमाणित रूप से इस प्रकार अंकित है:-

बेपरवाह मस्ताना जी द्वारा ‘धन धन दाता सावण शाह’ पर और ‘राधा स्वामी’ न बोलने के विषय में प्रबन्धकों ने हजूर बाबा सावन शाह जी के पास शिकायत कर दी। इस पर खुद-खुदा पूजनीय शहनशाह जी ने अपने मुर्शिद-प्यारे की हजूरी में उपस्थित होकर अर्ज की, “सच्चे पातशाह दातार जी! हमने राधा स्वामी को नहीं देखा। हमने तो केवल आप को ही देखा है और जो देखा है वो ही बोलते हैं। धन-धन दाता सावण शाह निरंकार तेरा ही आसरा।”
इस पर हजूर बाबा सावण शाह जी महाराज ने फरामाया,
“मस्ताना शाह! एक तो तुम दोषी हो और दूसरा हम को भी दोषी बना रहे हो।
हम कैसे निरंकार हुए?” शिकायत करने वाले वे प्रबन्धक सेवादार भाई भी वहीं पर ही मौजूद थे। यह भी संभव था कि सर्वसमर्थ अन्तरयामी मालिक ने उनका अहंकार तोड़ने और वास्तविकता को समझाने के लिए यह सारा खेल स्वयं रचा हो। वह था भी बिल्कुल सत्य क्योंकि परम पूजनीय शहनशाह मस्ताना जी महाराज ने उपरोक्त प्रश्न के उत्तर में जो फरमाया उससे वे सारे शर्मिन्दा हो गए
आप जी ने विनय की,

“सच्चे पातशाह जी ! प्रत्येक फकीर अपने ‘सतगुरु” के नाम पर मस्त हुआ है और अपने सतगुरु के प्रेम से ही मालिक तक पहुंचा है। प्रत्येक फकीर ने अपने सतगुरु को ओम, प्रभु, अल्लाह, राम, गॉड, वाहिगुरु, खुदा, रब्ब के रूप में माना है। अत: उसने अपने सतगुरु का ही कोटि-कोटि बार धन्यवाद किया है”

आप जी ने अपने ‘मुर्शिद’ जी की हजूरी में हजरत सुल्तान बाहू जी का अपने मुर्शिद (मीरां) के सत्कार में लिखा एक कलाम प्रस्तुत किया और अर्ज की कि बाहू भी अपने मुर्शिद मीरां को ‘रब्ब के रूप में देखता है और उपमा करता है। कलाम इस प्रकार है :-

बगदाद शहर दी की निशानी
उच्चियां लम्मियां चीरां हू।
तन-मन मेरा पुर्जे-पुर्जे, ज्यों दर्जी दियां लीरां हू।
इहना लीरां दी गल कफनी पा के
रलसां संग फकीरां हू।
बगदाद शहर दे ट्कडे/ मंगसां
बाहू करसां मीरां मीरां हू।

इसी तरह एक और कलाम भी लिखा था;-

पीर जिन्हां दा मीरां बाहू
सोई कंधी लगदे तरदे हू।

साईं बुल्ले शाह को भी अपने पीर शाह अनाइत जी के द्वारा ही मालिक के दर्शन-दीदार हुए।

अत: वह भी पूर्ण मुर्शिद का धन्यवाद करता है।

शाह अनाइत कीता पार।
हुण मैं लखेया ढोलण यार।

इसी प्रकार ईसाईयों ने अपने रहबर हजरत ईसा मसीह जी को ही गॉड, परमात्मा माना, क्योंकि परमात्मा उनके अन्दर समा गया था अर्थात परमात्मा के साथ मिल कर वह एक रूप हो गए |

मुस्लिम धर्म को मानने वालों ने अपने पीर हजरत मुहम्मद साहिब जी को ही खुदा का नूर, पैगम्बर (खुदा) माना। इसी प्रकार सिख धर्म में आता है कि श्री गुरू अर्जुन देव जी ने अपने सच्चे सतगुरु श्री गुरू राम दास जी के सच्चे प्यार को प्राप्त करके ही अपने सतगुरु को अपने अन्तःकरण में वाहिगुरू, परमात्मा के रूप में देखा।

इसलिए आप पवित्र गुरूवाणी में इस प्रकार फरमाते हैं:-

हरि जीओ नामु परिओ राम दास।

शहनशाह मस्ताना जी महाराज अपने सतगुरु के प्रति फरमाते हैं :-

“इस प्रकार सबने अपने मुर्शिद के ही गुण गाए हैं। हमारे लिए राधा स्वामी, अल्लाह, राम, खुदा, भगवान सब मर गए हैं। एक दाता सावण शाह ही हमारा सच्चा दाता, सच्चा पीर, सच्चा खुदा है। हम सावण शाह दाता का ही धन्यवाद करेंगे। क्यों न करें? यदि कोई किसी का दबा हुआ खजाना निकलवा दे तो वह धन्यवाद किसका करेगा? खजाना निकलवाने वाले का अथवा अन्य किसी का?” इस पर पूजनीय हजूर बाबा सावण सिंह जी ने पूजनीय शहनशाह मस्ताना जी पर अपनी रहमत की दृष्टि डालते व बहुत ही प्रसन्न होते हुए फरमाया, “मस्ताना शाह! तेरा यह बहुत ऊंचा कलाम है”। उसके पश्चात् अपने उन सत्संगियों की ओर संकेत करते हुए फरमाया, “कोई राधा स्वामी के पीछे पड़ गया, किसी ने अक्षरों को पकड़ लिया, कोई सुमिरन के पीछे लग गया, कोई नाम तथा रोशनी के पीछे भाग पड़ा परन्तु मुझे किसी ने नहीं पकड़ा। कोई भाग्यशाली हो तो मुझे पकडे ।
मस्ताना शाह! तुम बहुत भाग्यशाली हो।”

वाली दो जहान खुद-खुदा पूज्य मस्ताना जी ने फरमाया, “सच्चे पातशाह जी! हमारे लिए तो आप सब कुछ हो। हम और किसी को नहीं जानते। शहनशाह जी ! ये लोग भजन सुमिरन कर डट (दिखावा) करते हंः। क्या किसी ने राधा स्वामी को देखा है? यदि देखा है तो बताएं? अगर देखा होता तो शिकायत क्यों करते। सब लोग गर्दनें झुका कर खडे? हो गए। किसी ने कोई उत्तर नहीं दिया। पूज्य बेपरवाह जी ने फरमाया, हम अपने निरंकार दाता को सब के सामने प्रत्यक्ष दिखा सकते हैं।”

इसके साथ ही पूजनीय शहनशाह जी ने बहुत ही सत्कार से अपने मुर्शीद अपने खुद-खुदा पूज्य हजूर बाबा जी के पवित्र हाथ अपने कर-कमलों में लेकर पूरे जोश के साथ ऊंची आवाज में फरमाया, “देखो! ये है मेरा हाजर-नाजर निरंकार। यही मेरा पीर, खुदा, मां बाप, मेरी दौलत, मेरा यार, मेरा रब्ब और मेरा सब कुछ है”। इस पर पूजनीय हजूर बाबा सावण सिंह जी महाराज ने मुस्कराते हुए फरमाया, “मस्ताना शाह! तुम कहते हो कि हम ने राधा स्वामी को नहीं देखा। कल को लोग भी यही कहेंगे हमने सावन शाह को नहीं देखा। यह बात ठीक नहीं है।

इसलिए मस्ताना शाह! तुम ने जो देखा वही बोलना है परन्तु धन-धन सावन शाह बोलने की बजाय ‘धन धन सतगुरु तेरा ही आसरा’ बोला करो।”

इस सच्चाई से सिद्ध होता है कि सतगुरु के लिए दिए गए सम्मान को अन्तः:करण द्वारा अनुभव करो, क्या-क्या, खुशियां प्राप्त होती हं?। अन्दर से सतगुरु कितने निकट आते हैं। बाह्य निकटता के लिए कोई कितने विघ्न डाले किन्तु आन्तरिक निकटता ही सच का प्रमाण बनती है। चाहे इस प्रमाण को वह शिष्य केवल स्वयं अनुभव कर सकता है, पर यह भी वास्तविकता है कि आन्तरिक निकटता ही रहमतों को साक्षात् प्रकट करने का माध्यम बनती है। ऐसी रूहानी रहमतें जिनको सतगुरु के बिल्कुल निकट खडे! होने वाले शिष्यों में से भी बहुत से शिष्य प्राप्त करने में असमर्थ रहते हैं।

अधिक लोग यह ख्याल करते हैं कि पूर्ण मुर्शिद के पास खड़ा व्यक्ति जिसे अधिक समय सतगुरु के पास खड़ा होते ही हैं वह तो बहुत खुशियां प्राप्त करता होगा। वह तो “
सतगुरु से आमतौर पर बातचीत कर लेता है आदि। नि:सन्देह पूर्ण फकीर के दर्शनों और वार्तालाप द्वारा प्रसन्नता का प्राप्त होना उचित है और अनिवार्य भी है। पर यहां यह सोचना कि सतगुरु के पास रहता कोई शिष्य आन्तरिक तौर पर भी उनके निकट होगा, यह कोई जरूरी नहीं है। क्योंकि रूहों का व्यापारी वह पूर्ण सच्चा सतगुरु इन्सान की शारीरिक निकटता और अवस्था को देखकर आन्तरिक निकटता को प्रकट नहीं करता। बल्कि सतगुरु तो शिष्य की आन्तरिक रूह की पवित्रता और वैराग्यमयी अवस्था को देखता है। इस आधार पर ही सतगुरु शिष्य को आन्तरिक खुशियां, आन्तरिक निकटता एवं विश्वास की दृढ़ता प्रदान करता है।

उदाहरणार्थ- कई बार मैंने अपनी आंखों से देखा है कि कोई ऐसा इन्सान जिसकी शारीरिक अवस्था साधारण से भी निम्न स्तर की होती है। वस्त्र भी पुराने, फटे व मैले पहने होते हं। कोई साधारण व्यक्ति भी उससे बोलना पसंद नहीं करता और आश्रम में भी पहले उसे कभी देखा नहीं होता परन्त कई बार ऐसे इन्सान (शिष्य) के साथ हजूर पिताजी कितना ही समय बातचीत करते रहते हैं। बातें सुनने पर ऐसा लगता है कि जैसे कोई पुरानी बात याद आ गई हो और बात की श्रृंखला जल्दी टूटती ही नहीं। किसी शायर ने लिखा है:-

“नजर से उनकी पहली ही नजर, यूं मिल गई अपनी,
कि जैसे मुद्दतों से थी, उनसे दोस्ती अपनी।”

सतगुरु द्वारा ऐसे शिष्य के साथ अनिश्चित समय के लिए किया गया वार्तालाप पास खड़ी संगत को मुग्ध कर देता है। सोचिए ! यदि सुनने वाले खुशियों से झूमने लग जाते हैं तो जिसके साथ शहनशाह जी बात कर रहे होते हैं उसका क्या हाल होगा? इसके विषय में कह देना बुद्धि से परे की बात है। पर यह बात इस तथ्य को अवश्य स्पष्ट करती है कि जिसका हृदय जितना साफ, पाक-पवित्र और वैराग्यमयी होता है उतना ही वह आन्तरिक रूप से सतगुरु के निकट होता है।

ऐसे शिष्य का अपने मुर्शिद को ‘रब्ब’ कह कर सम्मानित करना साधारण लोगों के ध्यान को अपनी ओर आकर्षित करने के साथ-साथ उन पर प्रभाव भी डालता है। ऐसा ही वह शिष्य होता है जो जब साधारण लोगों में ऊंची आवाज से “धन धन सतगुरू तेरा ही आसरा” का पवित्र नारा लगाता है तो बड़े-बड़े ज्ञानी और शरीयत के अधीन लोग दांतों तले उंगली दबाते हैं। ऐसे शिष्य के साथ बातें करना तो दूर उनका साहस ही नहीं होता कि वे आंखों में आंखें डाल कर उसकी तरफ झांक भी सकें। ऐसा सच्चा शिष्य अपने सतगुरु के बिना किसी को ‘टुक ते डेला’ की भांति अर्थात कुछ भी नहीं समझता, चाहे ‘रब्ब’ भी सामने क्यों न खड़ा हो। किसी के आगे सिर झुकाना उसके विचारों की पंक्ति में नहीं आता। इसके लिए चाहे उसका ‘सिर’ ही क्यों न कट जाए। ऐसी सोच वाले शिष्य पर सतगुरु अधिक प्रसन्न होता है।

ऐसे शिष्य पर सतगुरु कदापि उंगली नहीं उठने देता और उस शिष्य को बेशुमार रहमतें बख्शता जाता है और शिष्य प्राप्त करता जाता है । किन्तु दुनिया के लोग 9 9 9 9 9 7? देखते ही रहते हैं, कहते ही रहते हैं और ठण्डी सांसें भरते रहते हैं। इस प्रकार वह शिष्य दुनिया की परवाह किए बिना मुर्शिद की याद अन्दर ही अन्दर प्रसन्नता को अनुभव करता रहता है। उसके लिए प्रत्येक दिन खुशियों से भरपूर होता है। प्रसिद्ध शायर शकील ने क्या सुन्दर लिखा है :-

“उनका जिक्र, उनकी तमन्ना, उनकी याद,
वक्त कितना कीमती है, इन दिनों।”

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