आशिकी भी और शिकवे भी ? Part -4

बड़ा मुश्किल है इन्सां का इन्सां होना।

इसी प्रकार सच्चा मुर्शिद ही होता है जो इन्सान के हर पल की खबर रखता है। ऐसे पल जो अधिकतर बुराइयों में गुजारे जाते हंः और इन्सानियत को आंखों से ओझल कर दिया जाता है। अत: उसे पशु कह देना भी कोई गलत बात नहीं होगी। सतगुरु सब कुछ जानता हुआ भी किसी का पर्दा नहीं उठाता बल्कि हर समय इन्सान को जाग्रत करता है।

इसके विषय में परम पूजनीय हजूर महाराज सन्त गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां सत्संग में इस प्रकार फरमाते है :-

“यही सतगुरु की महानता है कि वह लोगों के पर्दे नहीं उठाता, बल्कि पर्दे में ही रहने देता है। अगर वह पर्दा उठाने में आ जाए तो हमाम में सारे ही नंगे नजर आएंगे। यह तो उस मालिक का सतगुरु को हुक्म है कि पर्दा नहीं उठाना। वरना कई बार तो दिल करता है, जब बने होशियार। जब होशियारी सी दिखाता है ना कि मालिक इसको तो थोड़ा दिखा ही दिया जाए। लेकिन फिर वो मालिक रोकता है, नहीं यह इतना ही है, खाली लिफाफा ही है। अगर दिखा दिया तो हवा निकल जाएगी। बाद में मालिक की तरफ मुंह नहीं करेगा। तो इसीलिए जैसे ढका है ढका ही रहने दो।” आगे फिर फरमाते है :-

 “हे इन्सान! इस भ्रम में मत रह जाना, इस गुमान मे मत खो जाना कि वो अनजान है। जरा सोच! अगर सच्चा पूर्ण गुरू जानकार है तो जो मालिक, अल्लाह, वाहिगुरू राम है वो जानकारी से कैसे खाली हो सकता है। वो तो हर जगह है, वो तो जर्र-जर्र में हर कण में रहता है। तो हे इन्सान! तोबा कर कि मैं ऐसा नहीं करूंगा। फिर देख कैसा आनन्द, कैसी लज्जत, कैसी खुशियां तुझे मिलती हैं। अरे! जो लोग आप को उल्लू बनाते हैं वो भी समझ जाएंगे कि इसे भी कोई पूर्ण मुर्शिद मिल चुका है। वो भी फिर तेरे को अपने मतलब के लिए इस्तेमाल नहीं कर पाएंगे। तो हे इन्सान! मालिक से प्यार कर, सन्‍्तों की बात पर यकीन कर तो तेरे दोनों जहान सुधर जाएंगे।”अब आगे तो शिष्य का कर्तव्य बनता है कि ऐसे दयालु प्यारे और महान्‌ मुर्शिद का कितना कोई आदर करता है? सतगुरु की महानता को किस सीमा तक ऊंचा मानता है? अर्थात मुर्शिद के प्यार को किसी अन्य के समान रखकर तोलता है अथवा नहीं? इन प्रश्नों के उत्तर कोई स्वाभिमानी व्यक्ति अपने अन्दर ही अनुभव करेगा, क्योंकि हम सभी नहीं जानते हैं कि किसी को भी निश्चित तौर पर जबरदस्ती खीर नहीं खिलाई जा सकती। बुद्धिमान के लिए संकेत ही पर्याप्त होता है। 

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