आशिकी भी और शिकवे भी ? Part -3

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हजूर महाराज संत गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां अपने एक भजन द्वारा फरमाते हैं:-

टेक:- प्रेम पाके जो मुर्शिद का जीआ करते हैं।

ऐसे प्रेमी ना शिकवे गम किया करते हैं।

सुख-दु:ःख की तमीज नहीं, उस प्रेमी को होती है।

उसके लिए तो सब गुरू की कृपा होती है।

दुःख में ना रोता है,सुख में ना खोता है।

हर पल जुबां पे गुरू का ही नाम होता है।

‘शाह सतनाम जी’ प्रेम का जाम जी।

जो भी पी लेता है,वो सब भुला देता है।

दास कहे ‘मीत’ ना गुरू बिन जीआ करते हैं। प्रेम पाके जो ….

एक बार हजूर महाराज जी शाही स्टेज पर विराजमान थे रूहानी मजलिस चल रही थी। एक प्रेमी ने शब्द बोला जिसकी एक कड़ी में इस प्रकार आता है:-

सजदा भी करें, शिकवा भी करें, दीवानों का ये दस्तूर नहीं ।

इस पर हजूर महाराज जी ने फरमाया, “भाई! आजकल तो कोई सजदा करे चाहे ना करे पर शिकवा अवश्य करेंगे।”हजूर पिता जी ने यह कह कर सत्य और वास्तविकता को स्पष्ट कर दिया। यह कोई साधारण वचन नहीं है, बल्कि यह तो ऐसा वचन है जिसने वहां पर बैठे गर्वित इन्सानों को भी शर्मिन्दा कर दिया और उनका गर्व एक क्षण में चकनाचूर हो गया। स्वयं को मुर्शिद के सच्चे व निष्ठावान शिष्य बताते हुए शिष्यों में से कुछ वचन सुनकर बड़ी घुटन महसूस करने लगे । ऐसा प्रतीत होता था जैसे किसी ने पुराना घाव हरा कर दिया हो अथवा कोई पुराना चोर चोरी करते रंगे हाथों पकड़ा गया हो । वे गर्दन नीचे लटका कर बैठे थे और हजूर महाराज जी के नूरानी चेहरे को एकटक देखने में असमर्था अनुभव कर रहे थे। सच्चा मुर्शिद कुल मालिक का रूप होता है जैसे शीशे के गिलास में रखा हुआ कोई तरल पदार्थ हो। जिसमें प्रत्येक कण देखने वाले की दृष्टि से बच नहीं सकता। हजूर पिताजी के वचनों क श) इन दो पंक्तियों ने शिष्यों को वह सब कुछ एक फिल्म की भांति दिखा दिया और प्रेरित भी कर दिया। क्योंकि शिष्यों ने साधारण सी मांगे पूरी न होने पर बिना सोचे-समझे मुर्शिद के प्रति अन्दर से उलाहने शिकवे देने आरम्भ कर दिए थे। परन्तु फिर भी हम इस बात को बड़ी बात कहेंगे जो उन्होंने मुर्शिद के वचनों को सुनकर लज्जा अनुभव की तथा सच्चे दिल से पश्चाताप किया। आज के भयानक समय में जहां हाथ क ते हाथ खाए जा रहा है, वहां सच्चे नि:स्वार्थ एवम्‌ आत्मिक प्रेम के लिए किसी कारण से अनुभव की गई लज्जा एवम्‌ पश्चाताप भी सतगुरु की अपार रहमत के बिना सम्भव नहीं। वास्तव में अधिकतर लोग ऐसी गिनती में आते हैं, जिनके लिए मुर्शिद द्वारा फरमाए गए सच्चे और पवित्र वचन कोई विशेष अर्थ नहीं रखते। उनके लिए सतगुरु के दर्शन कर लेना और वचनों को केवल सुन लेना ही सत्संग कर लेना होता है। जबकि सत्संग में फरमाए गए सच्चे वचनों को ध्यान से सुन कर अपने जीवन में अपना लेने क शशे ही वास्तविक सत्संग कहा जाता है और उससे पूरा लाभ प्राप्त कर लेना होता है।

वहां मजलिस में मेरे साथ एक ऐसा शिष्य भी बैठा था और वह मझसे परिचित था। वह सतगुरु का ऐसा सच्चा शिष्य था जिसको मुर्शिंद प्रेम में पागल कह देना कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। हजूर महाराज जी के उपरोक्त वचन सुनकर वह उनके नूरानी मुखडे। को एकटक देखता रहा। वह गम्भीर हो गया और आंखों में वैराग्य के मोती टपकने लगे। मजलिस की समाप्ति के पश्चात मैंने उस प्रेमी से हजूर पिताजी के फरमाए गए वचनों का वर्णन किया तो उसने भरे हुए दिल से कहा, उस महान मुर्शिद से कौन और क्या भूला हुआ है। वह तो अन्तर्यामी है जो लोग केवल नतमस्तक हो जाते हं: किन्तु अमल में कोरे हैं ऐसे लोगों की गिनती बहुत ज्यादा है। कौन सतगुरु की याद में आंसू बहाता है और कौन उलाहने तथा शिकवों की वर्षा करता है! सच्चा सतगुरु अपने शिष्य के भले के लिए अपार रहमतों की वर्षा करता है। वही शिष्य एक कांटा चुभने पर भी सतगुरु के आगे उलाहनों तथा शिकवों का ढेर लगा देता है। इतना ही नहीं कई तो अपने ऊपर विपत्तियों के लिए सतगुरु को उत्तरदायी ठहराते हुए, किसी और जगह नतमस्तक होते देर नहीं लगाते परन्तु धन्य है हमारा मुर्शिद प्यारा जो हमारे असंख्य अवगुणों को देखकर भी दृष्टि विगति कर देता है। अपितु ऐसे समूह को प्रभु का रूप कहकर ही निवाजता है। हमारे जैसे गुनाहगारों और सच्चे सतगुरु की दास्तान भी एक विचित्र कहानी है। ऐसी कहानी जिस में सतगुरु किसी घर के ऐसे दयालु स्वामी का अभिनय करता है, जिसके घर रात को एक चोर आ गया पर उस स्वामी को उसकी चोरी करने की खबर लग गई। उसने सोचा यदि मैंने अपने पुत्रों को जगा दिया तो इस चोर की बहुत पिटाई होगी थाने में भेजा जाएगा, वहां इसे अधिक यातनाएं दी जाएंगी मुहल्ले का व्यक्ति है, फिर कभी समझा देंगे। अब ऐसा क्या किया जाए कि घर का सामान भी चोरी न हो और चोर को सुनाते हुए कहा, “बलदेव सिंह भाई! कल मुझे दिन के समय मिलना अब तुझे मिलने के लिए मेरे पास समय नहीं है। बहुत नींद आ रही है।” चोर समझ गया कि घर के स्वामी क थे पता चल गया है। अत: वह वहां से भाग गया। वह सोच रहा था कि दुनिया में यह पहला व्यक्ति है जिसने अपने घर में आए हुए चोर से सद्व्यवहार किया है। मैं उस का कैसे एहसान चुकाऊँगा। वास्तव मैं उस चोर में भी स्वाभिमान, लज्जा एवम्‌ इन्सानियत के कुछ अंश विद्यामान थे। जिन्होंने उसके अन्दर ऐसी सोच पैदा कर दी थी। नहीं तो आज के स्वार्थी युग में विशेष कर इस प्रकार के लोगों में मानवीय गुण बिल्कुल मर चुके होते हैं। ऐसे लोग इन्सानियत के नाम पर एक कलंक हैं। प्रसिद्ध शायर गालिब ने इस सम्बन्ध में उचित ही कहा हैं :-

बड़ा मुश्किल है इन्सां का इन्सां होना।

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