आशिकी भी और शिकवे भी ? Part -2

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भाई मण्झ की पूरी कहानी

“मण्झ प्यारा गुरू को, गुरू मण्झ प्यारा।

भाई मण्झ के सिर पर साहूकार का बहुत ऋ ण हो गया, इतना अधिक ऋ ण उतारने की शक्ति उसमें नहीं थी। उस साहूकार ने मण्झ को खरी-खरी सुना दी या तो ऋ ण वापिस कर दे नहीं तो गांव छोड़ कर चला जा। भाई मण्झ के परिवार में तीन सदस्य थे उसकी पत्नी, एक लड़की तथा स्वयं। वह अपने छोटे परिवार को लेकर गांव से चला गया। वह घास खोद कर लाता और शहर में बेच देता तथा अपना निर्वाह करता था। इस स्थिति में होते हुए भी उसका अपने सतगुरु के प्रति विश्वास दृढ़ हो चुका था। अर्थात वह अपनी अद्भूत मंजिल पर पहुंच चुका था। यह प्राय: कहा जाता है, ‘होर सारी दुनिया इक पासे मेरा सतगुरु प्यारा इक पासे’। एक दिन गुरू साहिब ने एक शिष्य को पत्र देकर भाई मण्झ के पास भेजा और यह भी फरमाया कि भाई मण्झ से पत्र के बदले बीस रुपए दक्षिणा भी ले आना। शिष्य ने जाकर सारी बात भाई मण्झ क ःश सुना दी। भाई मण्झ सतगुरू के पत्र के विषय मे सुन कर बहुत खुश हुआ। घर में बीस रुपए तो थे नहीं, परन्तु उस सच्चे शिष्य की पत्नी ने आभूषण उतार कर दे दिए। भाई मण्झ सुनार के पास गया और आभूषणों के बदले बीस रुपए लेकर उस शिष्य को देकर उससे पत्र प्राप्त कर लिया। भाई मण्झ पत्र को कभी छाती से लगाए कभी चूमे कभी माथे से लगाए और बार-बार अपने सतगुरु का धन्यवाद करे। इस प्रकार उसने सतगुरुका धन्यवाद करते हुए कहा कि मेरे जैसे तुच्छ व्यक्ति को भी आपजी ने अपने अन्त:करण में स्थान दे रखा है। उस प्रेम एवम्‌ वैराग्य युक्त वातावरण में भाई मण्झ की आंखों से प्यार के आंसू गिरने लगे, जिसके विषय में और लिख देना कलम की ताकत से बाहर की बात है |

कुछ दिनों के उपरान्त गुरू साहिब ने पहले की तरह ही एक अन्य पत्र एक शिष्य के हाथ भेजा और उसे कहा कि इसके बदले में पच्चीस रुपए दक्षिणा ले लेना। अब भाई मण्झ सोचता है कि पच्चीस रुपए क हां से लाए जाएं, जबकि घर में सायंकाल का भोजन बनाने का भी कोई पक्का विश्वास नहीं है। पत्र के लिए दक्षिणा भी हर अवस्था में देनी है। कोई समय था कि गांव का चौधरी अपने पुत्र के लिए भाई मण्झ की लड़की का रिश्ता स्वयं मांगता था, परन्तु भाई मण्झ ने उस समय चौधरी को अपने मुकाबले का न समझते हुए उसको जवाब दे दिया था। भाई मण्झ को विचार आया कि अब चौधरी को मिलना चाहिए उसकी पत्नी चौधरायन के पास गई और नम्रता से विनय करती हुई कहने लगी, हम अपनी पुत्री का रिश्ता आपके पुत्र के साथ करने के लिए तैयार हैं परन्तु हमें अब पच्चीस रुपयों की आवश्यकता है वह हमें दे दो। चौधरायन रिश्ते के लिए मान गई और उसने भाई मण्झ की पत्नी को पच्चीस रुपए दे दिए। भाई मण्झ पहले की तरह ही पत्र प्राप्त करके अत्यन्त खुश हुआ। उसी प्रकार ही पत्र का शुक्राना किया।

अभी भी भाई मण्झ की परीक्षा होनी शेष थी। कुछ समय पश्चात गुरू साहिब ने एक पत्र द्वारा भाई मण्झ क थे अपने दरबार मे बुला लिया और उसकी लंगर घर में भोजन बनाने व खिलाने की सेवा नियुक्त कर दी। भाई मण्झ जंगल में से लंगर के लिए लकडियां चुन क र लाता और उसकी पत्नी लंगर में झूठे बर्तनों को साफ करने क थी सेवा करती थी। कु छ दिनों पश्चात गुरू अर्जन देव जी ने किसी शिष्य से पूछा, ‘ भाई मण्झ खाना कहां से खाता है?’ उस शिष्य ने कहा, जी सारे लंगर में से खाते हैं और वह भी लगंर में से ही खाता है। गुरू साहिब कहने लगे,फिर तो वह सेवा की मजदूरी ले लेता है। भाई मण्झ की पत्नी ने गुरू साहिब का ये वचन सुन लिया और जाकर अपने पति को बता दिया। पर कुर्बान उस शिष्य के! भाई मण्झ तनिक भी अस्थिर नहीं हुआ, कहने लगा कल से कोई अन्य उपाए सोचेंगे। मन में इस बात का थोड़ा सा भी ख्याल नहीं आने दिया। जब आधी रात हुई तो वह जंगल में गया और लकड़ियां चुन कर लाया तथा उन्हें बाजार में बेच कर उन पैसों का भोजन खाया और फिर दरबार की सेवा में लग गया। कहते हैं:-

“वोह जिससे प्यार करता है, उसको आजमाता है।

खजाने रहमतों के,इसी बहाने लुटाता है।“

एक दिन जब वह जंगल में लकडियां लेने गया तो उसे वहां भयंकर अंधेरी ने घेर लिया। हवा ने इतने जोर से धक्का मारा कि वह बेचारा लकड़ियों समेत एक कु एं में जा गिरा। पूर्ण मुर्शिद अकाल पुरख का रूप होता है, जो सब के घट-घट की हर क्षण की खबर रखता है। गुरू साहिब दरबार में बैठे हुए अन्तर दृष्टि से सब कुछ देख रहे थे। जब भाई मण्झ के कुएं में गिरने की घटना घटी तो गुरू साहिब नंगे पांव ही उस की ओर दौड़ पडें और संगत को आदेश दिया कि वे रस्सा और सीढ़ शीघ्र लेकर आएं। सारी संगत हैरान हो गई कि ऐसा कया हो गया जिसने गुरू साहिब को नंगे पांव दौड़ने के लिए विवश कर दिया। गुरू साहिब उस कुएं के पास पहुंच गए। एक शिष्य को कहा कि वह भाई मण्झ को आवाज देकर कहे कि लकडियाँ कुएं में गिरा दे और स्वयं रस्से द्वारा से बाहर आ जाए। संगत ने रस्सी व सीढ़ी कूएं में लटका दी परन्तु भाई मण्झ कहने लगा, पहले लकडियां निकालो कही ये भीग न जाएं लंगर घर में इनकी बहुत आवश्यकता है। मैं बाद में बाहर निकल आऊंगा। अभी तक भी भाई मण्झज़्‌ की परीक्षा लेनी शेष थी। एक शिष्य कहने लगा,देख तेरी कितनी बुरी अवस्था हो गई है, कितने कष्टों में फंस गया है, छोड़ ऐसे गुरू को तथा लकड़ियों को और बाहर निकल आ। क्‍यों दुःख सहन कर रहा है। इतना सुनते ही भाई मण्झ फू ट-फ़ूट कर रोने लगा और कहने लगा, हाय! हाय!! मेरे मुर्शिद, मेरे खुदा,प्राण आधार को कुछ न कहो मेरी आत्मा को अत्यन्त दुःख होता है। तू मुझे बेशक कुछ कह ले लेकिन मेरे सतगुरु की शान के खिलाफ कुछ न बोल। उनके बारे में ऐसा एक भी शब्द सुनकर मेरा दिल तड़प उठता है। वह दृश्य देखने वाला संगत में एक भी ऐसा व्यक्ति नहीं था जिसकी आंखों में आंसू न छलके हों। पहले लकडियां बाहर निकाली गई फिर भाई मण्झ को बाहर निकाला गया। गुरू अर्जन देव जी भाई मण्झ पर बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने भाई मण्झ से पूछा, “भाई मण्झ ! हम तुम्हारे पर बहुत प्रसन्न हंः, मांगो कया मांगते हो। जो मांगोगे वह दे देंगे।” पर भाई मण्झ दर्शन-दीदार का भूखा, प्रेम का पुजारी एवम्‌ बलिदान की मुर्ति कहने लगा, सच्चे पातशाह जी ! मुझे कुछ नहीं चाहिए केवल आप ही मेरे सब कुछ हो। गुरू साहिब ये सुनकर अति प्रसन्न हुए और भाई मण्झ को पकड़कर छाती से लगा लिया एवं वरदान दिया।

“मण्झ प्यारा गुरू को, गुरू मण्झ प्यारा।

अर्थात जिसको आप नाम की दात बख्शोगे वह सरलता से ही संसार सागर से पार हो जाएगा।
देखो ! कितनी मुश्किलें सहन करने के पश्चात भी गुरू का सच्चा शिष्य अस्थिर नहीं हुआ। अपने सतगुरु बिना किसी अन्य का आश्रय नहीं हुआ। अपने सतगुरु के बिना किसी अन्य का आश्रय लेना तो दूर की बात रही अपितु दुःख, कष्ट एवम्‌ विपतियां आने पर भी अपने सतगुरु के प्रति रती भर भी गिला-शिकवा अपने मन में नहीं आने दिया।

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